
भयंकर गर्मी में भी पानी के लिए यूं दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर पाक विस्थापित
- 150 परिवार रह रहे हैं बस्ती में
- न बिजली न पानी, एक भी पक्का मकान नहीं
जोधपुर . भट्टी सा तपता इलाका और झुलसा देने वाली लू के थपेड़े। जहां कूलर पंखे और एसी भी फेल हो रहे हैं और लोग गर्मी से बेहाल हैं। सुबह 11 बजे ही सड़कों पर कफ्र्यू सा लग जाता है। इस मौसम में छप्पर तले गुजारा करने को मजबूर हैं इस बस्ती के लोग। न बिजली है और न पीने का पानी। एक किलोमीटर दूर से घड़े भरकर सिर पर पानी लाने के अलावा इनके पास कोई चारा नहीं है। ये है आंगणवा गांव में स्थित पाक विस्थापितों की बस्ती। इतने दु:ख झेलने के बाद भी यहां के लोगों का सिर्फ यही कहना है कि वापस पाकिस्तान तो नहीं जाएंगे। इनकी सबसे बड़ी मांग है कि पीने के पानी की व्यवस्था हो जाए। आंगणवा की पाक विस्थापित बस्ती में 150 परिवार हैं और करीब 700 लोग रह रहे हैं। इनको यहां रहते पांच साल का वक्त बीत चुका है। भीषण गर्मी में भी ये लोग तिरपाल व घास फूस से बने छप्परों में ही रह रहे हैं। पूरी बस्ती में एक भी पेड़ नहीं है। ऐसे में दोपहर के समय भी इनकों इन्हीं छप्परों में रहना पड़ता है। पत्थरों पर बसे होने के कारण यहां पेड़ लगना संभव भी नहीं है।
मंदिर से लाते हैं पानी, 350 रुपए में डलवाते हैं टैंकर
इस बस्ती में पीने के पानी की कोई लाईन नहीं डाली गई है। इस वजह से लोगों को करीब एक किलोमीटर दूर स्थित मंदिर से पानी लाना पड़ता है। मंदिर में ट्यूबवैल बना हुआ है। जो शाम के समय चलता है। इस ट्यूबवैल से भी पूरा पानी नहीं मिल पाता है। बस्ती के लोग मिलकर टैंकर से पानी मंगवाते हैं। एक टैंकर के 350 रुपए देने पड़ते हैं। पानी डालने के लिए भी इनके पास केवल प्लास्टिक की टंकियां हैं जिनमें पानी बहुत गरम रहता है।
पास से ही गुजर रही है पेयजल लाइन
बस्ती के ठीक पास से ही सुरपरा फिल्टर प्लांट की छोटी पेयजल लाइन गुजर रही है। इस लाइन में से कनेक्शन दिया जाए तो लोगों की समस्या कुछ हद तक दूर हो सकती है। पानी लाने के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा।
सौलर से ही करते हैं रोशनी
बस्ती में बिजली के कनेक्शन भी नहीं है। कुछ लोगों ने अपने घरों में रोशनी के लिए छोटी छोटी सौलर लाइटें लगा रखी हैं। ज्यादात्तर घरों में तो ये लाइटें भी नहीं है और लोगों को अंधेरे में ही रहना पड़ता है। बस्ती के ज्यादात्तर लोग मजदूरी करके ही पेट पाल रहे हैं। महिलाएं भी मजदूरी करने जाती हैं।
सिलाई का ले रहे प्रशिक्षण
यहां के लोगों को एक एनजीओ ने सिलाई का प्रशिक्षण दिया था। इसके बाद बस्ती में ही एक युवक ने प्रशिक्षण देना शुरू किया है। कुछ लोगों ने सिलाई काम भी शुरू कर दिया है। ये लोग बाजार से कपड़े लेकर जाते हैं और सील कर दे जाते हैं। इससे इनको पैसा भी अच्छा मिल जाता है।
कभी तो होगी सुनवाई
बस्ती में रहने वाले जगदीश, देंवेंद्र व प्रभू बताते हैं कि पहले उनका एक ही परिवार यहां आया था। उसके बाद धीरे धीरे लोग यहां आते गए। सिंध प्रांत में ये अपनी जमीनें व मकान छोड़कर आए हैं। पहले इनको एक एक महीने का वीजा मिलता था। अब धीरे धीरे सरकार इसमें बढोतरी कर रही है। कभी तो उनकी सुनवाई होगी और भारत की नागरिकता मिलेगी। उन्हें चाहे कितनी भी परेशानी उठानी पड़ें लेकिन वापस नहीं जाएंगे।
Published on:
30 May 2018 05:21 pm
