
भोपालगढ़/पत्रिका। भोपालगढ़ शहर सहित उपखण्ड क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में मौजूद ओरण-गोचर के साथ ही खेतों की मेड़ों व सड़क किनारे खड़ी बेर की झाड़ियां इन दिनों सर्दी के मौसम में गांवों के ऋतु फल लाल-पीले रंग के बेर से लकदक नजर आ रही हैं। साथ ही ग्रामीण भी एवं बच्चों ने लेकर बुजुर्गों तक सभी लोग इन मीठे फल का जमकर लुत्फ उठा रहे हैं ।
ग्रामीण क्षेत्र में कई जगह सड़क पर से होकर निकलने वाहन चालक भी इन्हें देखकर सड़क किनारे अपने वाहन खड़े कर झाड़ियों से बेर तोड़कर इनके स्वाद का लुत्फ उठाने से नहीं चूकते हैं। खाने में स्वादिष्ट व औषधीय गुणों से भरपूर पके हुए बेर हर किसी को भाते हैं। ग्रामीण इलाकों में इन दिनों महिलाओं व बच्चों के झुंड बेरों की झाड़ियों के इर्द-गिर्द आसानी से देखे जा सकते हैं।
देसी व बारिश के मीठे पानी से बिना किसी मेहनत के खेतों व नम भूमि में पनपने वाली झाड़ियों पर लगने वाले बेर अब किसानों व ग्रामीणों के लिए आमदनी का जरिया भी बन रहे हैं। गांवों में केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि महिलाओं से लेकर पुरुष भी झाड़ियों से बेर तोड़कर इकट्ठे कर रहे हैं। कई लोग तो इन्हें बाजार में बेचकर आय भी अर्जित कर रहे हैं।
ग्रामीणों के लिए बेर किसी ऋतुफल से कम नहीं है। आयुर्वेद के जानकर एवं धनवंतरी उद्यान बिराई के वैद्य खींवराज परिहार ने बताया कि राजस्थान में झाड़ियों पर लगने वाला बेर का फल कई पौष्टिक तत्वों से परिपूर्ण है। इसके अंदर विटामिन, खनिज, लवण व शर्करा आदि भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। मरुस्थलीय सेव कहे जाने वाले देसी बेर के फल में स्टार्च, शर्करा, कैल्सियम, फॉस्फोरस व लौह तत्व सहित विटामिन सी भी होता है। इसके अलावा बेर के फलों में अम्लता भी पाई जाती है।
वैद्य खींवराज परिहार के अनुसार झाड़ियों पर लगने वाले खट्टे -मीठे बेर औषधीय उपयोग के लिए प्रयुक्त होते हैं तथा इन फलों का सेवन करने से रक्त साफ होता है। साथ ही इसके सेवन से पाचन क्रिया ठीक रहती है। झाड़ी के कच्चे फल के सेवन से कफ बढ़ता है। जबकि पका हुआ फल शीतल, पचनीय और शक्तिवर्धक आहार माना गया है। शरद ऋतु का शारीरिक क्रियाओं पर भी असर पड़ता है। ऐसे में देसी मीठे बोर स्थानीय उपज का उपयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाने में भी सहायक है।
Published on:
18 Dec 2024 05:03 pm
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