
थार की पारिस्थितिकी में देखने को मिला बड़ा बदलाव, दक्षिण भारत की ओर माइग्रेट कर रही यहां की तितलियां
गजेंद्रसिंह दहिया/जोधपुर. जोधपुर, पाली, नागौर, बीकानेर, बाड़मेर, जालोर शहरों में सितम्बर के अंतिम दिनों में हरे रंग की तितली के उड़ते हुए झुण्ड लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गए थे। ये झुण्ड कई दिनों तक दोपहर के समय लगातार देखे गए। दरअसल यह तितली का माइग्रेशन (प्रवास) जलवायु परिवर्तन के कारण पहली बार थार मरुस्थल में देखने को मिला। यूरेशियाई प्रजाति की कैटोप्सीला पोमोना नाम की तितली झुण्ड में उडकऱ पूर्वी व दक्षिण भारत की ओर निकल गई। वैज्ञानिकों के अनुसार तितली का माइग्रेशन थार की पारिस्थितिकी में बदलाव है।
इस बार थार में मौसमी परिस्थितियां बदलने के कारण नमी व बरसात अधिक और तापमान कम था। कीट-पतगें भी बहुतायात में हो गए थे। अनुकूल परिस्थति में पोमोना ने यहां प्रजनन किया। बड़ी संख्या में अण्डे केटेरपीलर में बदलकर प्यूपा से वयस्क तितली बन गए। सितम्बर के अंतिम सप्ताह में बड़ी संख्या में पोमोना झुण्ड पाली से चितौडगढ़़ होते हुए दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान की तरफ गए। वहां से पोमोना के प्रायद्वीपीय भारत की ओर जाने की सूचना है।
एक ही दिशा में 10 मील प्रतिघण्टे की रफ्तार से उड़ान
250 से 300 वयस्क तितलियों के झुण्ड का माइग्रेशन करीब एक पखवाड़े तक सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक रहा था। यह कम ऊंचाई पर 10 से 15 मील प्रति घण्टे की रफ्तार से तीन लाइन में उड़ रहा था। प्रत्येक लाइन सौ यार्ड की थी। सामान्य उड़ान की तुलना में माइग्रेशन के समय इनकी गति तेज थी। शोधार्थी डॉ. इमरान खान ने बताया कि ये तितलियां गौरेया का यह पसंदीदा भोजन है। ऐसे में गौरेया से बचने के लिए एक दिन में 3500 से 4500 तितलियों ने माइग्रेशन किया।
दक्षिण भारत में मानसून के समय होता है माइग्रेशन
देश में सामान्यत: दक्षिण-पश्चिमी मानसून केरल पहुंचने से पहले ही तितलियों की कई प्रजातियां पश्चिमी घाट से पूर्वी घाट की ओर माइग्रेट करती हैं। दक्षिण-पश्चिमी मानसून खत्म होने और उत्तरी-पूर्वी मानसून शुरू होने के समय इनका रिवर्स माइग्रेशन होता है। उत्तरी-पूर्वी मानसून ने पिछले सप्ताह तमिलनाडू में दस्तक दे दी और तिततियां भी पश्चिमी घाट की ओर उडऩी शुरू हो गई।
मरुस्थली से मैदानी इलाके की जलवायु
रेगिस्तान में तितली का माइग्रेशन यहां की जलवायु परिवर्तन का संकेत हैं। रेगिस्तानी जिलों में धीरे-धीरे मैदानी इलाकों की ऊष्णकटिबंधीय वनस्पति उगने लगी है। मरुदभिद् वनस्पति कम हो रही है। पानी की मात्रा बढऩे के साथ नमी बढ़ रही है, जिससे नए पादप आएंगे। इसके अलावा बरसात के पैटर्न और सर्दी व गर्मी के दिनों में अंतराल भी देखने को मिलेगा।
पहली बार माइग्रेशन
मरुस्थल से तितली ने पहली बार माइग्रेशन किया है। यह जलवायु और पारिस्थितिकी कारकों के लिए जैव soochak का काम करती है। यानी थार मरुस्थल की जलवायु भी बदल रही है।
डॉ. अभिषेक राजपुरोहित, कीट रोग विशेषज्ञ, लाचू कॉलेज जोधपुर
Published on:
24 Oct 2019 12:05 pm
