मिर्च-मैथी निर्यात में रोड़ा अटका रहे 'कीडे़ Ó

- मिर्च में एसपर्जीलस फ्लेवर, बाजारा में, क्लेबीसेप्स माइक्रोसिफेला फंगस पाया जाता

जोधपुर।

By: Amit Dave

Published: 29 Mar 2019, 09:47 PM IST

जोधपुर।

मसाला उत्पादन में प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। उत्पादन की इस गति को बरकरार रखने के लिए मसालों की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरने में असफ ल होने से निर्यात के कंटेनर वापस लौटने से मसाला निर्यात को झटका लगा है। इससे किसानों को मसाला फ सलों की लागत निकलने में परेशानी आने लगी है है। प्रदेश में उत्पादित मिर्ची, मैथी, जीरा, धनिया व सौंफ सहित विभिन्न मसालों की गुणवत्ता अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा बेहतर होती है। किसानों में मसाला फ सलों की कटाई के बाद रखरखाव में जागरूकता की कमी तथा मसालों के भंडारण व पैकिंग के लिए पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में मसालों में अन्तरराष्ट्रीय मानकों पर तय मानको से अधिक रासायनिक कंटेंट मसालों में आ जाते है। जिससे मसालों का निर्यात प्रभावित हो रहा है।

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मिर्च निर्यात में बाधा एसपर्जीलस फ्लेवर

मसालों में अलग प्रकार के फंगस लगने, जीवाणु लगने व उनसे निकलने वाले जहर की वजह से फसलों को नुकसान होता है। विश्व प्रसिद्ध जोधपुर की मिर्च में एसपर्जीलस फ्लेवर फंगस (इससे एफ्ला टॉक्सिन नामक जहर निकलता है) की मात्रा होने के कारण पिछले कुछ समय से निर्यात में परेशानी आ रही है। इसी प्रकार, जीरा, मैथी, धनिया, सौंफ आदि मसालों में अलग-अलग फंगस लगते है, जो फसल को नुकसान पहुंचाते है। बाजरा में क्लेबीसेप्स माइक्रोसिफेला फंगस लगता है, जो अर्गट नामक जहर निकालता है।

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निर्यात के समय 3 अशुद्धियों की जांच

- मसाले में कचरे की जांच

- मसाले में नमी, फंगस के अलावा साल्मोनेला नामक जीवाणु की जांच होती है

- मसालों में रसायन प्रदूषण की जांच। इसमें फसल में छिड़कने वाले कीटनाशियों के मापदण्ड़ों की जांच आदि होती है।

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टनल में बरकरार रहती है गुणवत्ता व रंग

किसानों के सामने तुड़ाई के बाद मिर्च की गुणवत्ता को बरकरार रखना सबसे बड़ी समस्या होती है। किसान मिर्च की तुड़ाई करके खेत अथवा खलिहान में मिर्च को सुखाते है। जमीन के संपर्क में आने पर एसपर्जीलस फ्लेवर फंगस लग जाता है। यह फंगस नमी, ओस व बारिश के कारण पनपता है। इससे मिर्च का रंग उड़ जाता है। साथ ही मिर्च सूखने में 15-20 दिन का समय लगता है। कृषि विवि द्वारा तैयार टनल तकनीक से अंदर का तापमान 12-15 सेंटिग्रेड बढ़ जाता है। साथ ही, धूप सीधे संपर्क में नहीं आती है, इससे रंग नहीं उड़ता है। इस विधि से मिर्च सूखने में 5 दिन और मैथी 2 दिन में सूखकर तैयार हो जाती है।

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विवि के वैज्ञानिकों द्वारा तैयारा टनल तकनीक को किसान अपनाने लगे है। फिर भी, अधिकांश किसान इस तकनीक को नहीं अपना पाए है। इस तकनीक से जोधपुर की मिर्च और नागौर की मैथी व अन्य मसाला फसलों का रंग बरकरार रहेगा, गुणवत्ता बनी रहेगी और किसानों को अच्छे दाम भी मिलेंगे।

डॉ. एमएल मेहरिया, जनसंपर्क अधिकारी

कृषि विवि, जोधपुर

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Amit Dave Reporting
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