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जोधपुर में पहले निभाई जाती थी रामा-श्यामा, आज की जनरेशन ऑनलाइन विश की निभा रही रीत

दुल्हन की तरह पुरी तिराहा से नई सडक़तक सजा हुआ बाजार। गाडिय़ों का आवागमन भी बिल्कुल बंद रहता। जिस राह पर चलते वहां आंखें ऊपर करने पर सतरंगी रोशनी नजर आती। यकीन मानिए इस रोशनी को देखने पूरा जोधपुर शहर उमड़ पड़ता।
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जोधपुर में पहले निभाई जाती थी रामा-श्यामा, आज की जनरेशन ऑनलाइन विश की निभा रही रीत

जोधपुर. दुल्हन की तरह पुरी तिराहा से नई सडक़तक सजा हुआ बाजार। गाडिय़ों का आवागमन भी बिल्कुल बंद रहता। जिस राह पर चलते वहां आंखें ऊपर करने पर सतरंगी रोशनी नजर आती। यकीन मानिए इस रोशनी को देखने पूरा जोधपुर शहर उमड़ पड़ता। घर में बच्चे पटाखे जलाते तो युवा व नए कपल्स रोशनी देखने घर से बाहर निकला करते। आज के इस दौर में महज दुकानों तक रोशनी रह गई। ये नजारा था जोधपुर में दिवाली पर होने वाली रोशनी का। इस रोशनी के नजारे को देखने लोग विशेषकर सोजती गेट व नई सडक़ आया करते थे, लेकिन आजकल ये रोशनी अब एक कहानी बन गई।

व्यापारी भी ‘अपणायत’ से आवभगत करते
हम जब लोग छोटे थे, तब रोशनी देखने जाया करते थे। आज मेरी उम्र 78 वर्ष है। इस रोशनी का तात्पर्य ये था कि उस समय में शहर में लोग बाजार की सुंदरता और भव्यता देखें। नई सडक़ व सर्राफा बाजार पर व्यापारी पेशेवर न होकर अपणायत के साथ इलायची, सुपारी व सौंफ आदि की मनवार करते। ये प्रेम अब कहां रहा? कई जगह मिल्करोज तक पिलाया जाता। भले ही हम ग्राहक हैं या राहगीर, मान-मनवारे सभी की होती। बाजार में फूल आकृति की देसी लाइटें। बल्लियों व पत्तियों के सहारे रंगबिरंगी आकार की लाइटें बहुत अभिभूत किया करती थीं। सरकार की ओर से भी राशि खर्च होती थी, लेकिन अब सरकार की ओर से सहयोग नहीं मिलता। इसी कारण आजकल रोशनी नहीं हुआ करती है। आज के दौर में युवा पीढ़ी मोबाइल के जरिए ही रोशनी दिखाती है और भेजती है। पहले रोशनी के बहाने कइयों से रामा-श्याम हो जाया करती थी। अब टेक्नोलॉजी का युग है, सभी ऑनलाइन चेहरे देख विश कर देते हैं।
- रामकुमार कल्ला, शहरवासी

्रवो दौर अब बन गया कहानी
मेरी उम्र 55 वर्ष की हो चुकी हैं। मैं 15 वर्ष का था, तब से रोशनी देखता आया हूं। 15-20 वर्षों से शहर में रोशनी नहीं हो रही है। पुरी तिराहा, स्टेशन रोड, नई सडक़ की रोशनी देखने दोस्तों के साथ जाया करता था। बाकायदा लाइन में लगकर अनुशासन के साथ सभी मित्र मंडली रोशनी का लुत्फ उठाया करती थीं। उस समय शहर के सर्राफा बाजार, तंबाकू बाजार, त्रिपोलिया से शुरू होकर हम नई सडक़व पुरी तिराहा की शानदार रोशनी देखने जाया करते थे। फिर सरदारपुरा बी रोड कूच करते थे। वह दौर बेहद स्वर्णिम था। शादी के बाद सभी मित्र परिवार को साथ ले जाने लगे। लेकिन अब शहर में रोशनी होना एक कहानी बन गया है।
- कपच पुरोहित, शहरवासी

हमारे लिए वाकई कहानी
पापा व दादा से रोशनी का सुना था, लेकिन आज तक देखा नहीं। हमारी दिवाली केवल पटाखों तक सीमित है। ज्यादा से ज्यादा दिनभर मोबाइल पर सभी को पगेलागना कह देते हैं। दूसरे दिन रामा-श्यामा पर ननिहाल, भुआ, मौसी व अन्य नातेदारों के यहां होकर आ जाया करते हंै। लेकिन ज्यादा घर रामा-श्याम के नहीं जा पाते, इतना समय भी नहीं मिल पाता। पुरानी रोशनी अब एक बार पुन होनी चाहिए, ताकि मेरी उम्र के युवा व बच्चे भी रोशनी को देखें। अब तो नए दिन होटल व रेस्त्रां जाकर दिवाली मनाकर आ जाते हैं। वैसे हमने तो रोशनी का सुना है, लेकिन चचेरे छोटे भाई-बहन तो बिलकुल ही अनजान है।
- विनम्र ओझा, शहरवासी

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