
गवरीदेवी ने मांड गायकी से बनाई थी अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान
जोधपुर. मास्को में जब ‘भारत महोत्सव 1983’ चल रहा था, तब ‘मारवाड़‘ की मरु-कोकिला ने ‘केसरिया बालम’ मांड गायन प्रस्तुत कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। जोधपुर की मांड गायन मलिका गवरी देवी के साथ वह क्षण राजस्थान व भारतीय संस्कृति के लिए गौरवशाली था।
बीकानेर के राजदरबारी गायक बंशीलाल-जमुनादेवी दमामी के घर 14 अप्रैल 1920 को जन्मी गवरीदेवी का घर संगीत से जुड़ा था और परिवार ने ही उन्हें मां सरस्वती की शरण में संगीत सिखाया। कण्ठ की माधुर्यता में भजन, ठुमरी, लोक संगीत, गजल, मांड के साथ दरबारी गायन में सिद्धहस्त होने के बाद उनकी पहचान कलाकार के रूप में हुई। गवरी देवी का विवाह 20 वर्ष की आयु में जोधपुर के जागीरदार मोहनलाल गामेती के साथ हुआ लेकिन अल्प आयु में ही पति को खोना पड़ा लेकिन गायकी नहीं छोड़ी।
जोधपुर महाराजा उम्मेदसिंह ने गवरीदेवी को संरक्षण व प्रोत्साहन दिया। बीकानेर राजघरानों में विविध गायकी ने उच्च स्तरीय श्रेणी के गायकों में ला दिया। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर ने इनकी आवाज को बुलन्द करते हुए अन्तर्राज्यीय सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अन्तर्गत उड़ीसा, कर्नाटक, महाराष्ट, गोवा, बंगाल, केरल, तमिलनाडू आदि प्रान्तों में भेजा।
गवरी देवी के 100 गीत ध्वनिबंद भी किए गए। एचएमवी ने उनका एलपी रिकार्ड भी जारी किया जिससे उनकी ख्याति बढ़ती चली गई। भारत सरकार ने केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी के सर्वोच्च पुरस्कार तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन के हाथों ताम्रपत्र भी प्रदान किया गया जो जो एक लोक कलाकार के लिए उच्च सम्मान था।
मरणोपरांत राजस्थान रत्न
राजस्थान सरकार की ओर से मरणोपरांत वर्ष 2012 में गवरी देवी को राजस्थान का सर्वोच्च पुरस्कार ‘राजस्थान रत्न ’ से नवाजा गया। वे आज भी ‘राजस्थान की मरुकोकिला ’ से ख्याति प्राप्त है। गवरी देवी 29 जून 1988 को अलविदा कहा पर उनकी पहचान मांड गायकी -केसरिया बालम, आओ ना..इतिहास रच गयी।
उनकी गायकी सांस्कृतिक धरोहर
अपनी खनकदार गायकी से गवरी देवी ने देश-दुनिया में अपनी पहचान बनाई थी। मारवाड़ की मरु कोकिला गवरी देवी की मांड गायकी आज भी अपना जादू बिखरने में सफल है।
महेश कुमार पंवार, पूर्व सचिव, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर
Published on:
29 Jun 2020 07:30 am
