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जोधपुर

गिळडू रोग ने बिगाड़ा सांगरी का स्वाद, कम पैदावार के चलते बादाम से भी दुगने हुए दाम

देश - विदेश के विभिन्न हिस्सों में होता सांगरी का निर्यात , बढ़ते दाम 1200 रुपए प्रतिकिलो तक पहुंचे

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जोधपुर/ लोहावट मारवाड़ के कल्पवृक्ष कहे जाने वाले खेजड़ी के पेड़ पर लगने वाली सांगरी की पैदावार में इस बार कमी आ गई है। इसका कारण सांगरी फली में इस बार गिळडू (रोग) लगना है।

पेड़ पर फली लगने के स्थान पर (गोल गांठ) पड़ गई। देश व विदेश में पसंद की जाने वाली स्वादिष्ट व सर्वाधिक महंगी सूखी सब्जियों में शुमार सांगरी के कम मात्रा में पैदावार से इसके दामों में भी ऊछाल आया है। खेजड़ी के पेड़ पर मार्च व अप्रेल माह में लदकद रहने वाली सांगरी में फली के साथ गिडू (गोल गांठ) पड़ गई। जानकारों इस बार मौसम में उतार-चढ़ाव से भी सांगरी का उत्पादन प्रभावित हुआ है। मारवाड़ में शादियों की सीजन में नजर आने वाली सांगरी की सब्जी लांजी इस बार मीनू से गायब हो चुकी है।

इस बार सूखे मेवे को भी छोडा पीछे

बाजार में अभी सूखी सांगरी 1000 से 1200 रुपए के बीच प्रति किलो बिक रही है। पिछली बार 600 से 800 रुपए प्रति किलो के भाव थे। बाजार में सांगरी के भाव सूखे मेवे से भी ज्यादा है। इस बार सांगरी के नाम मात्र आवक से किसानों व ग्रामीणों की आमदनी प्रभावित होगी। सांगरी पूरी तरह से ऑर्गेनिक होने के साथ औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती है।

उत्पादन घटा

खेजड़ी के पेड़ में फूल(मिंझर) लगते समय एरियोफाइड माइट्स नामक कीट लग जाने से सांगरी की जगह गिळडू बन जाते है। इसके साथ ही मौसमी बदलाव भी इसका कारण माना जाता है। इससे सांगरी का लगभग 90 प्रतिशत उत्पादन घट जाता है।

– पुखराज जाणी, सहायक कृषि अधिकारी लोहावट

देश के कई भागों में मांग

देश में पश्चिमी राजस्थान में जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, सांचौर, नागौर सहित कई जिलों में सांगरी की सबसे अधिक पैदावार होती है। राजस्थान से महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब सहित दक्षिण भारत के कई राज्यों व देश की बड़ी मंडियों में इसकी मांग बनी रहती है। होटलों व रेस्टोरेंट में महंगे दामों में इसकी सब्जी बिकती है। यहां तक विदेशों में भी निर्यात की जाती है।