
जोधपुर. रहमत बरस रही है मुहम्मद के शहर में, हर शै में ताजगी है मुहम्मद के शहर में, आते हैं बख्शवाने गुनाहों को गुनाहगार, किस्मत बदल रही है मुहम्मद के शहर में….़। अल्लाह ने हज के दौैरान अपने बंदों के लिए नेकियों और सवाब के खजाने खोल दिए हैं। अल्लाह ने हज की पाकीजा जगह पर दुआ कुबूल होने का वादा किया है। मारवाड़ हज वेलफेयर सोसाइटी के निदेशक हाजी इकरामुद्दीन ने यह बात बताई। उन्होंने पत्रिका से मुलाकात में बताया कि मदीना मुनव्वरा की मस्जिदे-कुबा में नमाज पढऩे का सवाब एक उमराह के बराबर अता किया जाता है। यहां तक कि पैगम्बर हजरत मुहम्मद के रोजा-ए-रसूल के पास एेसी जगह है, जहां नमाज अदा करना जन्नत में नमाज अदा करने के बराबर है। इसे रियाजतुल-जन्ना कहा जाता है।
यह है हज
हाजी इकरामुद्दीन ने बताया कि अरबी शब्द कोश में हज का अर्थ कस्द यानी इरादा करना है। यह शरियत में अल्लाह के घर काबा शरीफ ताजीम यानी इज्जत और इबादत की नीयत से आना है। इसी तरह उमराह का अर्थ कस्द या जियारत करना है। हज इस्लाम का वह रुक्न है जिसमें जिस्मानी, आर्थिक और कल्बी इबादतों को एक साथ कर दिया गया है।
हाजी से हाथ मिलाओ
उन्होंने बताया कि खुदा और रसूल से मुहब्बत करने वालों के लिए हज एक इम्तेहान है, जिसमें आदमी सब चीजों को खैरबाद कह कर अल्लाह के हुजूर में निकल जाता है। इसके लिए वह किसी तरह की तकनीफ की परवाह नहीं करता। एक रिवायत है कि हुजूर सअव ने फरमाया -जब तुम में से किसी हज पर जाने वाले से मुलाकात हो तो उसके अपने घर में पहुंचने से पहले उससे मुसाफा करो यानी हाथ मिलाओ। क्यों कि वह इस हालत में है कि उसके गुनाहों की माफी हो चुकी है।
कोई गुनाह बाकी नहीं रहता
निदेशक हाजी इकरामुद्दीन ने बताया कि हुजूर ने इरशाद फरमाया है कि जो शख्स हज की नीयत से निकले, उसकी सवारी का कदम आगे बढे़ तो एक नेकी लिख दी जाती है और एक बुराई मिट जाती है और एक दर्जा बुलंद फरमाता है, वह शख्स जो अल्लाह की खुशी के लिए हज को जाता है और बताए गए अरकान के मुताबिक हज अदा करता है तो वह एेसे लौटता है जैसे उसी दिन पैदा हुआ हो। यानी उस पर कोई गुनाह बाकी नहीं रहता।
हरम में इबादत का सवाब एक लाख गुना
उन्होंने बतया कि अगर वह हज के बाद की जिन्दगी में अच्छे अखलाक रखे और गुनाहों से बचता रहे, बिना नामो- नुमूद दुनिया बसर करता रहे तो एेसे शख्स के लिए सिर्फ जन्नत है। हरम शरीफ यानी काबा शरीफ की एक नेकी एक लाख नेकियों के बराबर है। हरम में की गई किसी भी इबादत का सवाब यानी पुण्य एक लाख गुना रखा गया है। हज उमराह करने वाले अल्लाह के मेहमान हैं। अल्लाह उनकी कोई भी जायज दुआ और इल्तिजा रद्द नहीं फरमाता।