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जोधपुर में चल रहा है ‘हल्दी गोठ’ का दौर, सर्द मौसम में निभाई जा रही है साथ खाने की परंपरा

भोजन की मनुहार के लिए प्रसिद्ध जोधपुर में सर्दियों के दौरान अब मेहमान की थाली में हल्दी की सब्जी तो दिखती है, वहीं सामूहिक गोठ के आयोजन भी खूब चल रहे हैं। हर मोहल्ले व कॉलोनी की मित्र मंडलिया हल्दी गोठ का आयोजन करा रही है।
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haldi goath in jodhpur is world famous for delicious turmeric cuisine

जोधपुर में चल रहा है ‘हल्दी गोठ’ का दौर, सर्द मौसम में निभाई जा रही है साथ खाने की परंपरा

नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. भोजन की मनुहार के लिए प्रसिद्ध जोधपुर में सर्दियों के दौरान अब मेहमान की थाली में हल्दी की सब्जी तो दिखती है, वहीं सामूहिक गोठ के आयोजन भी खूब चल रहे हैं। हर मोहल्ले व कॉलोनी की मित्र मंडलिया हल्दी गोठ का आयोजन करा रही है। वैसे भी यहां दिसम्बर से फरवरी तक सामाजिक और स्वयंसेवी संस्थाओं की बैठकें, सभा और गोष्ठियां भी हल्दी गोठ में तब्दील हो जाती है। यहां 36 कौम के लोगों की गोठ होती है लेकिन पुष्करणा ब्राह्मण, माहेश्वरी और कुम्हार समाज की ओर से आयोजित ‘हल्दी गोठ’ जोधपुर में सर्वाधिक लोकप्रिय है

क्या है ‘हल्दी गोठ’
यह गोठ एक ही प्रकार के विचारों वाले व्यक्तियों वाले समूहों की ओर से आयोजित स्नेह भोज होता है जो एक निश्चत शुल्क, स्वैच्छिक सहयोग, संगठन के खर्च या एकल व्यक्ति की ओर से किसी खास खुशी और मौके पर व्यय करके आयोजित किया जाता है। गोठ में सब्जी के नाम पर हल्दी की सब्जी और साथ में गेहूं की रोटी, बाजरे का सोगरा, मक्की की रोटी भी हो सकती है। सर्दी में हल्दी गोठ किसी व्यक्ति के घर, कार्यस्थल, सभाभवन में पिकनिक स्पॉट, भोगीशैल पहाडिय़ों में स्थित मन्दिर प्रांगण में, वन-उपवन, रिसोर्ट, खेत, तालाब अथवा झील के किनारे कहीं भी आयोजित की जा सकती है।

हल्दी पचाने के अनुकूल है मौसम
गीली या कच्ची हल्दी के तौल बराबर देशी घीके अलावा लहसुन, मटर,पनीर, फूलगोभी, सूखे मेवे आदि में से कुछ भी हल्दी के साथ मिश्रण के बाद विधिवत पकाकर स्वाद लिया जा सकता है। अक्सर दिसम्बर माह में हल्दी की नई पैदावर बाजार में आती है तब सस्ती होती है। सर्द मौसम भी हल्दी पचाने के अनुकूल होता है। हल्दी इस मौसम में स्वास्थ्य की मांग भी होती है।

मारवाड़ के इतिहास में ‘गोठ’ परम्परा
जोधपुर में गोठ मनाने की परम्परा के उल्लेख प्राचीन, मध्य और आधुनिक काल में मिलते है लेकिन सबसे अधिक प्रमाण जोधपुर महाराजा तख्तसिंह की ख्यात 1843 से 1873 में मिलती है जिनमें अनेकों अवसर पर मारवाड़ के मुत्सदी, ताजीमी जागीरदार, खास पासवान, बख्शी, दीवान, हाकम, किलेदार अनेकों अवसर पर महाराजाओं को गोठ के लिए आमंत्रित करते थे। जोधपुर में भीमभडक़, तख्तगढ़ माचिया किला, कायलाना गोठ के लिए प्रसिद्ध था। यहां पर शिकार भी होता था और गोठ भी होती थी।

गोठ और गोष्ठी दोनों एक दूसरे के पर्याय
गोठ और गोष्ठी एक दूसरे के पर्याय है। गोठ में भोजन तैयार होने तक एकदूसरे से विचार विमर्श, अनुभव, किस्से, मजाक, मसखरी, आमोद प्रमोद, खेल, उलाहना, कहावतों के माध्यम हंसी ठिठोली होती है। गोठ में गोष्ठी के माध्यम से एक पूरा ज्ञान का संचार एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी में होता था। वर्तमान समय में मोबाइल में खोए रहने के बजाए समाज के लोगों को पारम्परिक गोठ प्रणाली से जुडकऱ जीवन को आनंददायक बनाना चाहिए।
-डॉ. एमएस तंवर, उपप्रबंधक, महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश, मेहरानगढ़

इसकी बात ही निराली है
पौषमास में होने वाली ‘हल्दी गोठ’ में परिवार के सभी सदस्यों के साथ खास मित्र, परिचितों को शामिल किया जाता है। दिसम्बर-जनवरी में होने वाली हल्दी की गोठ की शुरुआत सुबह दाल के बड़ों व पुदीने की चटनी से होती है। हल्दी की सब्जी के साथ रुखी रोटी साथ में पापड़ तथा अंत में मलाई वाला दूध भी शामिल होता है। श्रावण मास की गोठ में कढ़ी-पुड़ी के साथ तली हुई हरी मिर्च तथा शाम को एक किलो आटे के साथ सोलह किलो दूध तथा मेवों के मिश्रण के साथ ‘सोळिया’ बनाया जाता है।
-शारदा व्यास, सामाजिक कार्यकर्ता

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