
इलाज तो ढूंढना होगा
इलाज तो ढूंढना होगा
सिकन्दर पारीक
नगर निगम और जेडीए में फाइलों के गायब होने का सिलसिला लम्बे समय से चल रहा है। लेकिन, अब राजस्थान हाईकोर्ट ने यहां हाईकोर्ट प्रशासन से पूछा है कि फाइलें गायब होने की समस्या का इलाज क्या है? वाकई, यह सवाल चिंतित करने वाला है क्योंकि यह सीधा न्याय व्यवस्था से जुड़ा है। उस व्यवस्था से, जिस पर हर नागरिक का भरोसा टिका व जुड़ा है। मामलों की अधिकता और कम स्टाफ की वजह से न्याय में देरी के प्रकरण तो आते रहते हैं लेकिन इस तरह न्याय के दरवाजे से फाइलें गायब होने का सवाल हरेक के मन को कचोटने व झकझोरने वाला है।
आज न्यायपालिका परेशान लोगों के लिए समाधान का माध्यम है, निराश लोगों के लिए आशा की किरण है, गलत कार्य करने वालों के लिए भय का कारण है। इस देश में जो लोग कानून की पालना करते हैं और कहीं प्रताडि़त होते हैं तो उन्हें राहत न्याय व्यवस्था से ही मिलती है।
यह एक सम्मान और गर्व का स्थान है। अगर यहां फाइलें गायब होती है और किसी गलत इंसान के हाथों में पहुंच जाती है तो जाहिर है कि पीड़ा उस व्यक्ति को झेलनी होगी, जो न्याय के मंदिर में इंसाफ की राह तक रहा है। सबूतों में छेड़छाड़ का भय भी बना रहता है। कानून सबूत मांगता है और अगर सबूत में ही छेड़छाड़ हो गई तो न्याय कैसे मिलेगा?
देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने न्याय व्यवस्था को लेकर 15 सुझाव दिए थे, इनमें से एक में उन्होंने कहा था कि बेशक केस लंबित रहने में जजों की कमी की भूमिका है, लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में कुछ अदालतें अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। उनके तौर तरीके अपनाने की जरूरत है। ऑटोमेशन सिस्टम, ई-कोर्ट और अदालती रिकॉर्ड को डिजिटल करना बेहद जरूरी है। अगर संभव हो तो ऐसे इंतजाम किए जाए जो प्रक्रिया को आसान बनाएं, वरना सभी के लिए न्याय का मकसद पूरा होना मुश्किल हो जाएगा।
बहरहाल, हाईकोर्ट से फाइलों के गायब होने की पीड़ा लाजिमी है। यही वह स्थल है, जहां 'देर है लेकिन अंधेर नहीं।Ó आशा की जानी चाहिए कि न केवल फाइलें गायब करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी बल्कि ऐसे कार्मिकों पर भी गाज गिरेगी, जो इस तरह के कार्यों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग कर रहे हैं।
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Updated on:
06 Sept 2019 10:53 pm
Published on:
06 Sept 2019 10:53 pm
