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आइआइटी ने लैब में बनाया नया अणु, अल्जाइमर बीमारी का पता चल सकेगा

- चूहों पर किया प्रयोग, बीमारी की खोज व तीव्रता की जानकारी प्रतीदिप्ती के जरिए मिल सकेगी - वर्ष 2030 तक भारत में 76 लाख लोग होंगे अल्जाइमर से ग्रसित
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आइआइटी ने लैब में बनाया नया अणु, अल्जाइमर बीमारी का पता चल सकेगा

आइआइटी ने लैब में बनाया नया अणु, अल्जाइमर बीमारी का पता चल सकेगा

जोधपुर. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) जोधपुर सहित देश के तीन प्रमुख संस्थानों ने मस्तिष्क में याददाश्त की कमी के लिए जिम्मेदार अल्जाइमर बीमारी का पता लगाने के लिए नया तरीका विकसित किया है। इसके लिए लैब में नए अणु की खोज की गई है जो मस्तिष्क में जाकर प्रतीदिप्ती प्रकाश के जरिए अल्जाइमर बीमारी और उसकी तीव्रता का मापन करेगा। इसके लिए चूहे के मस्तिष्क पर सफलतापूर्वक प्रयोग किए गए। भविष्य में इस अणु के जरिए अल्जाइमर बीमारी का शुरुआती दौर में ही पता चल सकेगा। यह रिसर्च एससीएस केमिकल न्यूरोसाइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है। गौरतलब है कि डिमेंशिया इंडिया रिपोर्ट 2010 और अल्जाइमर्स एंड रिलेटेड डिसऑर्डर्स सोसाइटी ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत में 76 लाख लोग अल्जाइमर और उससे जुड़ी बीमारी से पीड़ित होंगे।

क्या होती है अल्जाइमर बीमारी

मानव मस्तिष्क में कई मस्तिष्क कोशिकाएं या न्यूरॉन्स होते हैं। मस्तिष्क में दो प्रोटीन एमलाइड बीटा और ताऊ का निर्माण होता है जो मस्तिष्क कोशिका के अंदर और उसके चारों ओर एक प्लैक का निर्माण करते हैं। इससे मस्तिष्क कोशिकाओं धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है और स्मृति क्षमता में कमी आती है। इसे भूलने की बीमारी भी कहते हैं।

शोधार्थियों के नाम पर रखा अणु का नाम आरएम-28

अल्जाइमर बीमारी का पता लगाने की खोज आइआइटी जोधपुर के अलावा आइआइटी खड़कपुर और सीएसआईआर: इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी कोलकाता ने की है। इस अनुसंधान में आइआइटी जोधपुर के बायो साइंस विभाग के प्रोफेसर डॉ सुरजीत घोष के नेतृत्व में उनके शोधार्थियों रथनाम मलैस, जूही खान और राजशेखर रॉय शामिल है। अपने शोधार्थियों के नाम पर अणु का नाम आरएम-28 रखा है।

मस्तिष्क में देना पड़ेगा इंजेक्शन

आरएम-28 अणु फ्लोरोसेंट है। यह मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार के रंग पैदा करता है। इसका इंजेक्शन किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में देने पर यह मस्तिष्क कोशिकाओं में पहुंचता है। शुरुआत में इसका रंग पीला, उसके बाद नारंगी और उसके बाद रंग तीव्रता में बदलाव आता है। इससे अल्जाइमर बीमारी की स्थिति और उसकी गंभीरता के बारे में जानकारी मिल सकती है। यह निदान काफी सस्ता है। भविष्य में इसका व्यावसायिकरण किया जाएगा।

- प्रो सुरजीत घोष, बायो साइंस विभाग, आइआइटी जोधपुर

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