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प्राकृतिक आवास खत्म होने से बढ़ रही नीलगायों की मुश्किलें

खेतों की बढ़ती तारबंदी से आहार संकट, शहर में आबादी विस्तार बना परेशानी
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प्राकृतिक आवास खत्म होने से बढ़ रही नीलगायों की मुश्किलें

प्राकृतिक आवास खत्म होने से बढ़ रही नीलगायों की मुश्किलें

नंदकिशोर सारस्वत

जोधपुर. वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास खत्म होने और खेतों में कंटीली तारबंदी के बाद भोजन के अभाव में कई प्रजातियों के वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट आने लगा है। वन्यजीवों में सबसे ज्यादा असर नीलगाय पर होने लगा है। गोचर, ओरण पर लगातार अतिक्रमण के कारण परम्परागत आश्रय स्थल खत्म होने से रोजड़े अब शहर के विभिन्न क्षेत्रों के रिहायशी क्षेत्रों में पहुंचने लगे है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में 1972 की अनुसूचि डी में शामिल वन्यजीव रोजड़ों के शिकार पर प्रतिबंध है।

पर्यटन स्थलों के आसपास भोजन की तलाश

शहर के पर्यटन स्थल कायलाना रोड व किला रोड पर अक्सर भोजन पानी की तलाश में रोजड़े पहुंचने लगे है। इसके अलावा शहर के एयरफोर्स, रसाला रोड, सरदार क्लब पोलो, मधुबन, बनाड़, मंडोर -नागौर रोड, चौपासनी हाउसिंग बोर्ड, जेएनवीयू न्यू कैम्पस, आफरी के आसपास रिहायशी क्षेत्रों में भी इनकी संख्या बढ़ रही है। भोजन की तलाश में अक्सर सड़कों पर विचरण करते समय रोजड़ों के तेज दौडऩे से वाहन दुर्घटना अथवा जन हानि भी हो सकती है।

हर साल 300 से अधिक घायल

संभाग के एकमात्र वन्यजीव चिकित्सालय में लाए जाने वाले घायल वन्यजीवों में सर्वाधिक संख्या नीलगायों की है। हर साल करीब 300 रोजड़े वाहन दुर्घटनाओं, सूखे कुएं में गिर जाने तथा खेतों की तारबंदी में फंस कर घायल होकर अपनी जान तक गंवा देते है। समूचे एशिया में आकार में सबसे बड़े एंटीलोप प्रजाति के वन्यजीव नील गाय (बोसेपेफस ट्रेगोकेमेलस ) को मारवाड़ में रोजडा कहा जाता है। जोधपुर जिले के विभिन्न क्षेत्रों में रोजड़ों की संख्या 20 से 25 हजार है।

पांच साल पहले बनी योजना कागजों में दफन

रोजड़ों को नुकसान किए बिना उनकी लगातार बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाने के लिए वनविभाग की ओर से पांच साल पहले मुख्य वन संरक्षक जीएस भारद्वाज के नेतृत्व में योजना तैयार की गई थी। योजना के तहत रोजड़ों को किसी भी तरह नुकसान किए बिना ट्रेन्क्यूलाइजिंग गन से प्रविष्ट होने वाली वैक्सीन 'गोनाकोनÓ के माध्यम से नसबंदी का अभियान शुरू किया जाना था। लेकिन अधिकारी के स्थानान्तरण होने के बाद से ही यह योजना कागजों में ही सिमट कर गई। नीलगायों को गोचर ओरण भूमि पर विशाल जालीनुमा बाड़े (शेल्टर) का निर्माण कर गोशाला की तरह चारे व पानी की समूचित व्यवस्था के प्रयास भी शुरू हुए लेकिन ये सरकारी उदासीनता के कारण ये प्रयास भी विफल रहे।

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