
Jodhpur Foundation Day - जोधपुर. शहर की अपणायत और भाईचारा भारत विभाजन के समय भी कायम रहा था। यह शांति बनाए रखने में एक ओर, दो गांधीवादियों उमाशंकर त्रिपाठी 'बंधुजी' और नेमिचंद्र जैन 'भावुक' गांधीवाद और सद्भावना की शमा रोशन किए हुए थे, वहीं दो मशहूर शाइरों की दोस्ती लोग आज भी याद करते हैं। वो थे दाग़ स्कूल से जुड़े सीमाब अकबराबादी के शागिर्द रमज़ी इटावी और बिस्मिल भरतपुरी के शागिर्द मोहनलाल कौल।
जोधपुर के ये दोनों ही शाइर दोस्त देश और साहित्य जगत के लिए सद्भावना के राजदूत साबित हुए। जोधपुर शहर के सौहार्द और सद्भावना की यह सबसे बड़ी मिसाल है कि अपने ज़माने के इस मशहूर शाइर ने इटावा से जोधपुर आकर बसना और यहां रहकर सुकून से सृजन करना पसंद किया। साल 1912 में जन्मे इटावी ने सन् 1932 में जोधपुर के लिए शेर कहा था-
और शहरों में ख़ून मिलता है,
जोधपुर में सुकून मिलता है।
चिराग़े-मुहब्बत जलाओ ज़मीं पर,
अंधेरा न रह जाए यारो कहीं पर।
जोधपुर में 11 जनवरी 1914 को जन्मे कौल कालांतर में अजमेर चले गए और वहीं उनका निधन हुआ। कौल ने अपने कलाम के माध्यम से धर्म-जाति के बजाय मानवता और अपणायत की बात कहकर ऐसे सद्भावना फैलाई -
कोई कहता है- मैं बिरहमन हूं,
कोई कहता है,- मैं मुसलमां हूं
मैं तो ये हूं न वो ख़ुदा की क़सम
सीधा सादा सा एक इंसा हूं।
रमज़ी महाराजा उम्मेदसिंह के समय उस्ताद अली अकबर खां के साथ शिप हाउस स्थित राजघराने के जोधपुर रेडियो पर उर्दू सैक्शन के इंचार्ज रहे। भारत विभाजन के बाद देश के हालात पर इटावी ने लोगों को उनके धर्म की दुहाई देते हुए 'ख़ूनी नुमाइश' नामक लंबी नज़्म कही थी, जो पंडित नेहरू ने आल इंडिया रेडियो पर प्रसारित करवाई। इटावी ने स्वयं बताया था कि महात्मा गांधी के निधन की खबर सुनते ही मशहूर शाइर और जोधपुर की तत्कालीन नगर परिषद के सचिव मोहनलाल कौल ने परिषद में शोकसभा में बापू की तस्वीर लगवाकर उस पर लाल गीली रूई उनके सीने पर रखवाई थी। इटावी ने शेर पढ़ा था तो उनका सुनते ही लोग रो पड़े थे-मैं सीने पे
दाग़ इक लिए जा रहा हूं,
अहिंसा की क़ीमत दिए जा रहा हूं।
Published on:
12 May 2022 03:30 pm
