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यह कैसी इमरजेंसी ? बह रही उल्टी गंगा

- सीनियर डॉक्टरों के रेफर केस देखते हैं रेजीडेंट

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Jodhpur : What kind of emergency in Hospitals ?

यह कैसी इमरजेंसी ? बह रही उल्टी गंगा

बिग इश्यू : संभाग के सबसे बड़े एमडीएम अस्पताल में रेजीडेंटों के भरोसे इमरजेंसी सुविधाएं

-वरिष्ठ विशेषज्ञ चिकित्सकों की इमरजेंसी में नहीं रहती ड्यूटी


जोधपुर.

जोधपुर में संभाग के सबसे बड़े मथुरादास माथुर अस्पताल (एमडीएम) की ट्रोमा व इमरजेंसी सेवा रेजीडेंट डॉक्टरों के भरोसे है। जहां मरीज को तत्काल श्रेष्ठ उपचार की जरूरत होती है, वहां वरिष्ठ विशेषज्ञ चिकित्सकों की ड्यूटी नहीं होती। जबकि जयपुर एसएमएस के ट्रोमा सेन्टर में न्यूरो, ऑर्थो, सर्जरी, मेडिकल के एक-एक वरिष्ठ विशेषज्ञ की 24 घंटे ड्यूटी सुनिश्चित है। उनके साथ रेजीडेंट सहयोगी के तौर पर काम करते हैं। बड़ा सवाल है कि जब एसएमएस में यह व्यवस्था हो सकती है तो जोधपुर में क्यों नहीं?


एसएमएस ट्रोमा व जोधपुर के एमडीएम अस्पताल की ट्रोमा-इमरजेंसी में आने वाले मरीजों या केसों की संख्या में ज्यादा फर्क नहीं है। एसएमएस की इमरजेंसी या ट्रोमा सेन्टर में प्रतिदिन करीब 500 केस आते हैं, जबकि एमडीएम इमरजेंसी व ट्रोमा सेन्टर में करीब 400 केस या मरीज आते हैं। प्रबंधन के ढीले रवैए के कारण एमडीएम अस्पताल की इमरजेंसी में वरिष्ठ विशेषज्ञ फैकल्टी की ड्यूटी सुनिश्चित नहीं की जा रही है।

हालत यह है कि जोधपुर संभाग या जिले के कस्बों की पीएससी या सीएचसी पर तैनात कनिष्ठ या वरिष्ठ विशेषज्ञ फिजीशियन या सर्जन जिन मरीजों को रेफर करते हैं, उन्हें एमडीएम के जूनियर यानि रेजीडेंट (विद्यार्थी) देखते हैं। सवाल यह है कि जिन मरीजों को सीनियर हैण्डल नहीं कर सके, उन्हें रेजीडेंट (विद्यार्थी) कैसे हैण्डल करते होंगे? यहां इमरजेंसी में केवल दुर्घटना ही नहीं, बल्कि ऑर्थो, सर्जरी, न्यूरो सर्जरी व मेडिकल के केस भी आते हैं, लेकिन आपात स्थिति के समय एमडीएम इमरजेंसी में इनसे संबंधित वरिष्ठ विशेषज्ञ नहीं मिलते। मरीज की स्थिति गंभीर हो तो एम्बुलेंस भेजकर वरिष्ठ विशेषज्ञ को बुलाया जाता है।

एमडीएम अस्पताल प्रशासन ने इमरजेंसी व ट्रोमा में सीएमओ (कैज्यूल्टी मेडिकल ऑफिसर) के रूप में एक वरिष्ठ चिकित्सक की ड्यूटी तीन शिफ्ट में 24 घंटे सुनिश्चित कर रखी है। लेकिन इनके जिम्मे प्रशासनिक काम ही रहते हैं, या यह चिकित्सक जिस विभाग संबंधित है, उसके अलावा गंभीर केस संभालना भी इनके लिए संभव नहीं होता।


यह है डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की गाइडलाइन में स्पष्ट निर्देश है कि ट्रोमा केयर यूनिट या इमरजेंसी का सैटअप पूरी तरह से अलग होना चाहिए। इमरजेंसी में सभी तरह के वरिष्ठ विशेषज्ञों की टीम की ड्यूटी सुनिश्चित होनी चाहिए। ट्रोमा केयर यूनिट में तमाम तरह की सुविधाएं भी गाइडलाइन में निर्देशित है, लेकिन जोधपुर के ट्रोमा केयर में इस तरह की सुविधा के प्रति कोई गंभीरता दिखाई नहीं दे रही है।

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अस्पताल अधीक्षक डॉ. एमके आसेरी से सीधी बात

सवाल : जिले की सीएचसी या पीएचसी में सीनियर चिकित्सकों की ओर से रेफर किए केस को ट्रोमा सेन्टर या इमरजेंसी में कौन देखते हैं?

रेफर या इमरजेंसी केस रेजीडेंट ही देखते हैं। जरूरत होने पर वरिष्ठ विशेषज्ञ को ऑन कॉल बुला लिया जाता है।


सवाल : वरिष्ठ विशेषज्ञ को बुलाने तक लगने वाले समय में यदि मरीज की जान चली जाएं तो कौन जिम्मेदार है?

ऐसा नहीं होता, रेजीडेंट भी जिम्मेदार होते हैं, वो मरीज की पूरी केयर करते हैं, जब तक वरिष्ठ विशेषज्ञ पहुंच जाते हैं?

सवाल : अस्पताल में अन्य वार्डों की तुलना में अधिक मौतें क्या इमरजेंसी में ही होती हैं, और होती है तो कितनी?
हां, यह सही है कि इमरजेंसी में जान का खतरा ज्यादा होता है। मौतें कितनी हुई, यह आंकड़ा मेरे पास अपडेट नहीं है।

सवाल : जब सबसे ज्यादा मौतें इमरजेंसी में ही हो रही हैं, तो विशेषज्ञों की ड्यूटी क्यों नहीं लगती?

एमडीएम के पास इतने चिकित्सक नहीं है कि इमरजेंसी में एक साथ न्यूरो, न्यूरो सर्जरी, ऑर्थो व मेडिसिन के विशेषज्ञ की ड्यूटी नियमित रूप से ट्रोमा में भी लगाई जा सके।


सवाल : आखिर कब तक ऐसे हालात रहेंगे?

सरकार से अतिरिक्त पद स्वीकृत कराए जाएंगे, सरकार ने ट्रोमा हॉस्पिटल की घोषणा की है। पद स्वीकृत होंगे तो व्यवस्थाएं सुधर जाएंगी।

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