
आखिर क्या हुआ ऐसा कि बेटे अपने पिता को अंतिम बार देख भी नहीं सके
ओम टेलर. जोधपुर. अब्बा अस्थमा के मरीज थे। पिछले पांच-छह वर्षों से इलाज चल रहा था। लॉकडाउन तबीयत बिगड़ी तो सरकारी अस्पताल ले गए। उन्हें भर्ती किया ओर दूसरी दिन उनकी मौत हो गई। हमें बताए बिना उन्हें दफना दिया गया। हम चार भाई है। इससे बड़ा दुभाग्य किया होगा कि अब्बा का अंतिम बार मुंह तक नहीं देख सके उनकी कब्र पर मिट्टी तक नहीं डाल सके। इतना कहते ही अशरफ हसन की आंखों में आंसू छलक गए।
नई सड़क दर्पण सिनेमा के पीछे की तरफ रहने वाले शबीर हसन (67) की एक जून को तबीयत बिगड़ गई। उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। परिजन सरकारी अस्पताल ले गए। जहां उन्हें भर्ती किया गया। दो जून की रात को उनकी मौत हो गई। उनके बेटे अशरफ हसन का आरोप है कि उनके बिना बताए पिता शबीर हसन को दफना दिया गया। उन्हें अंतिम बार मुंह तक नहीं देखने दिया। अम्मी कमरुन्निशा तो अभी भी सदमे में है। उसने बताया कि कोरोना जांच करवाई तो दो बच्चों सहित परिवार के पांच जनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। जिस पर उन्हें घर पर ही 24 दिन कोरोनटाइन रखा गया। बाद में सभी स्वस्थ हो गए।
काश जिसका इलाज चल रहा था वह डॉक्टर देख लेता
अशरफ हसन ने कहना है कि उनके पिता अस्थमा के मरीज थे। जिस डॉक्टर का इलाज चल रहा था वह लॉकडाउन में कोरोना के डर से मरीजों को घर पर चेक नहीं कर रहा था। अगर अब् बा (शबीर हसन) का वह इलाज करता तो शायद वे आज हमारे बीच होते।
जोधपुरी जूती बनाने के लिए कई बार हुए सम्मानित
मृतक शबीर हसन जोधपुर की प्रसिद्ध जूती बनाने के अच्छे कारीगर थे। पिछली पांच-छह पीढिय़ां जूती बनाने का काम कर रही है। वर्ष 2011 में देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रवण मुखर्जी के हाथों वे शिल्प गुरु अवार्ड से नई दिल्ली में सम्मानित भी हो चुके है। इसके साथ ही उनको ओर भी कई इनामों से नवाजा गया।
Published on:
20 Jun 2020 09:47 pm
