
फलोदी. झाडिय़ों से अटा पड़ा खीचन नदी व धोरों का क्षेत्र। पत्रिका
महेश कुमार सोनी
फलोदी. सात समन्दर पार कर प्रतिवर्ष शीतकातीन प्रवास पर खीचन आने वाले मेहमान परिन्दे कुरजां की मनमोहक और रोमांचित कर देने वाली अठखेलियां अब खीचन के धोरों पर नहीं मिलती हैं। क्योंकि खीचन नदी के पास धोरों को अनदेखी की झाडिय़ों ने घेर लिया है। लिहाजा धोरों पर लगातार फैलते झाडिय़ों के जाल के चलते कुरजां ने समय के साथ खुद को ढालते हुए खीचन में प्रवास के दौरान सुबह विश्राम के लिए गांव के आस-पास आबादी से दूर नए ठिकाने ढूंढ लिए है। यह दृश्य पिछले करीब ७-८ सालों से देखा जा रहा है। जिसमें कुरजां रात्रि विश्राम के बाद खीचन में धोरों की बजाय मैदानों में विचरण करने लगी है। कुरजां के व्यवहार में आए इस परिवर्तन को लेकर पेश है एक रिपोर्ट-
पहले धोरों पर होती थी अठखेलियां-
करीब ७-८ साल पूर्व तक कुरजां यहां आकर नमक उत्पादन क्षेत्र में रात्रि विश्राम के बाद सुबह खीचन पंहुचती थी, फिर यहां खीचन नदी के पास धोरों पर आकर पर्यटकों को अपनी अठखेलियों से आकर्षित करती थी। यहां धोरों पर कुरजां का स्वच्छंद विचरण पर्यटकों को काफी लुभाता था तथा कुरजां धोरों पर बैठकर बेहतरीन नजारा पेश करती थी। धोरों पर बैठने के बाद धीरे-धीरे पक्षियों के समूह नीचे उतरकर पक्षी चुग्गाघर तक आते थे।
अब खुले मैदान तरफ किया रुख-
धोरों पर समय के साथ भारी मात्रा में झाडिय़ों के फैलाव से अब कुरजां पक्षी यहां महफूज नहीं है और पक्षियों ने पिछले करीब ७-८ साल धोरों की तरफ जाना छोड़ दिया है। उसके बाद अब कुरजां खीचन में सुबह खुले मैदानों में विचरण करती है तथा कुछ समय बाद चुग्गाघर आ जाती है।
एंटीप्रिडेटरी बिहेवियर से बदली जगह-
पक्षियों में खुद को किसी शिकारी जानवर से बचाने के लिए व्यवहार में किया गया परिवर्तन एंटीप्रिडेटरी बिहेवियर कहलाता है। यहां धोरों व आस-पास उगी झाडिय़ों में शिकारी श्वानों के खतरे व उडऩे में परेशानी की वजह से कुरजां द्वारा धोरों पर आना बंद कर देने की संभावना है। (निसं)
जूलीफ्लोरो से मैदान हो रहे हैं कम-
प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा के बहुत ज्यादा फैलाव के कारण खुले मैदान कम हो रहे हैं और डेमोसाइल क्रेन, वल्चर आदि को उडऩे से पहले दौड़ लगाने के लिए आवश्यक स्थान उपलब्ध नहीं हो पाता है। साथ ही पक्षियों को इन झाडिय़ों के पीछे शिकारी जानवर के छिपे होने की आशंका रहती है। जिसके चलते पक्षियों में एंटीप्रिडेटरी बिहेवियर देखने को मिलता है।
डॉ. अनिल छंगाणी, पक्षी विशेषज्ञ एवं डीन विज्ञान संकाय, महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर
खीचन नदी व धोरों में उगी झाडिय़ों के कारण पिछले करीब ७-८ सालों से कुरजां ने धोरों पर विचरण करना बंद कर दिया है तथा अब पक्षी मैदानों में विचरण करते हैं। इस संबंध में प्रशासन को अवगत करवाया जा चुका है।
सेवाराम माली, पक्षीप्रेमी, खीचन (फलोदी)

Published on:
19 Jun 2018 11:31 am
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