
शिकारियों और श्वान से बचे चिंकारों पर नई मुसीबत
नंदकिशोर सारस्वत
जोधपुर. निरकुंश वन्यजीव शिकार, श्वानों के बढ़ते हमलों के बीच खुले मैदानों में विचरण करने वाले थार के चिंकारों को अब नई मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिमी राजस्थान के थार में विचरण करने वाले चिंकारों में इन दिनों हाइपोडर्मा बोवीस नामक बीमारी फैल रही है। हालांकी वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है की यह बीमारी अगस्त माह से शुरू होकर नवम्बर तक चिंकारों में फैलती है लेकिन स्वत: ही ठीक भी हो जाती है। जैसलमेर के लाठी क्षेत्र में लगभग 80 प्रतिशत चिंकारे इस बीमारी से ग्रसित हो चुके है। बाड़मेर में भी कई चिंकारों में यह बीमारी नजर आई है। वनविभाग वन्यजीव प्रभाग जोधपुर के सहायक वन संरक्षक केके व्यास के अनुसार चिंकारों के शरीर में यह बीमारी दरअसल वारबल मक्खी के लार्वा होते हैं। मक्खी जब पशुओं अथवा चिंकारों के शरीर पर अंडे देती हैं तो अंडे से लार्वा बनता है जो शरीर उभारनुमा नजर आता है। करीब 20 दिनों के बाद प्युपा फार्म बनकर चिंकारों के शरीर से नीचे गिर जाता है। इससे वन्यजीवों को कुछ दिन शारीरिक परेशानी तो होती है लेकिन यह प्रकृति चक्र में स्वत: ही ठीक भी हो जाती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए चिंकारे जैसे वन्य जीवों को पकड़ कर इलाज करना भी संभव नहीं है। वैक्सिनेशन के लिए अभी तक विभाग की ओर से कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है।
जाए तो जाए कहां
लगातार कम होते वनक्षेत्र में वन्य प्राणियों को भोजन एवं विश्राम के लिए कोई ठोर नहीं है। चिंकारों के लिए स्थाई घास के मैदान नहीं होने के कारण खेतों के आसपास ही रहते है। खेतों की सुरक्षा के लिए अधिकांश किसानों ने श्वान पालना शुरू कर दिया गया है। चिंकारे जैसे ही खेतों में भोजन के लिए जाते है तो आसानी से श्वानों का शिकार बनकर जान गंवा देते है। खेतों को छोड़ कर अन्यत्र जाने पर वन्यजीव शिकारी अपना निशाना बना देते है। केवल कुछ समुदाय विशेष बहुल क्षेत्रों में ही चिंकारे स्वच्छंद विचरण करते देखे जा सकते है।
प्रकृति चक्र का ही हिस्सा
मारवाड़ में यह बीमारी अगस्त से नवम्बर तक चिंकारों में होती है। जबकि काले हरिणों यह बीमारी नहीं पाई जाती है। यह बीमारी स्वत: ही ठीक हो जाती है। यह प्रकृति चक्र का ही हिस्सा है। इस बीमारी की दवाई तो है लेकिन चिंकारे जैसे वन्यजीव को पकड़ कर देना उचित व व्यवहारिक प्रतीत नहीं होता है। इससे चिंकारे की मौत तक हो सकती है। इस बीमारी से स्वास्थ्य कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है।
डॉ. श्रवणसिंह राठौड़, वन्यजीव चिकित्सक, भारतीय वन्यजीव संस्थान
Published on:
04 Oct 2020 09:58 pm
