
ऐतिहासिक माचिया किले के प्रवेश द्वार खोलने में अधिकारियों की रुचि नहीं
जोधपुर. स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में वतनपरस्तों के कैदखाने के तौर पर उनके जंगी हौसलों के गवाह रहे जोधपुर के कायलाना की मनोरम पहाडिय़ों में स्थित ऐतिहासिक माचिया किले को दर्शकों के लिए खोलने के प्रति वन अधिकारियों में कोई रुचि नहीं है। रक्षित वनक्षेत्र में स्थित माचिया किले के प्रवेश द्वार दर्शकों के लिए खोलने में भारतीय वन संरक्षण अधिनियम 1980 के प्रावधान सबसे बड़ी बाधा बने हुए है। वन संरक्षण अधिनियमों के कारण स्वतंत्रता सेनानियों की गौरवशाली गाथा और दास्तान से जुड़े स्मारक तक किसी को भी पहुंचने तक की अनुमति नहीं है। इसके लिए भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति लेने के लिए लंबी चौड़ी कागजी खाना पूर्ति जरूरी है। इसी परेशानी से बचने के लिए वन अधिकारी पिछले कई दशकों से मामले में टालमटोल रवैया अपनाते रहे है। यही कारण है कि किले के अंदर निर्मित दालान, कमरें, गलियारों और चहारदीवारी पर दर्ज स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की स्मृतियां वीरानी के साए में दफन होती जा रही है। स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की स्मृति में निर्मित कीर्ति स्तंभ भी धूल फांक रहा है।
31 आजादी के दीवानों को रखा गया था नजरबंद
वर्ष 1942 में भारतीय स्वतंत्रता के आंदोलन के दौरान जोधपुर संभाग के 31 आजादी के दीवानों को दिसम्बर 1942 से अगस्त 1943 तक करीब 8 माह तक नजरबंद करने के दौरान कई तरह की यातनाएं सहनी पड़ी थी। जंगे आजादी के सिपाहियों के परिजन लंबे अर्से से माचिया किले को खोलने की मांग करते रहे है। वर्तमान में माचिया बॉयोलॉजिकल पार्क का हिस्सा बन चुके माचिया किले के प्रवेश द्वार यदि खोल दिए जाए तो जोधपुर आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों के लिए एक और पर्यटन स्थल और जंगे आजादी के सिपाहियों की यातनाओं से जुड़ा स्मारक लोगों में देशभक्ति का संचार करता रहेगा।
बिना अनुमति प्रवेश नहीं
माचिया किला वर्तमान में वनक्षेत्र में स्थित है और भारतीय वन संरक्षण अधिनियम के तहत वन क्षेत्र में किसी भी तरह का गैर वानिकी गतिविधियां अथवा पर्यटन गतिविधियां संचालित नहीं की जा सकती है। यही कारण है कि अभी तक दर्शकों का प्रवेश यहां वर्जित है।
केके व्यास, सहायक वन संरक्षक जोधपुर
Updated on:
31 Jan 2021 12:33 pm
Published on:
31 Jan 2021 12:33 pm
