
फलोदी किले की निर्माणाधीन प्राचीर ढहने के बाद बिखरा मलबा।
फलोदी (जोधपुर). पांच सौ सालों से भी अधिक समय से फलोदी के इतिहास संजोए प्राचीन किले की निर्माणाधीन बुर्ज रविवार दोपहर सवा दो बजे ढह गई। गनीमत रही कि जिस समय बुर्ज ढही उस समय मौके पर मजदूर नहीं थे और लोहे की बल्लियों ने पत्थरों को सड़क पर आने से पहले रोक दिया, जिससे बुर्ज के पत्थर नुकसान नहीं पहुंचा सके और बल्लियों के घेरे में ही पत्थर सिमट कर रह गए।
जानकारों के अनुसार किले के पश्चिमी छोर के भाग में उत्तरी दीवार करीब दस साल पहले गिर गई थी, जिसे किले के 3 करोड़ की लागत से किए जा रहे जीर्णोद्धार के तहत बुर्ज का पुनर्निर्माण किया जा रहा था, बुर्ज की दीवार बनने के साथ ही धडा़म से गिर गई।
डेढ़ महीने से हो रहा था बुर्ज का निर्माण
दुर्ग की पश्चिमी बुर्जों में से उत्तरी बुर्ज के पुनर्निर्माण का कार्य डेढ़ महीने पहले शुरू किया था और वर्तमान में बुर्ज की दीवार करीब 22 से 25 फ ीट ऊंचाई तक बन गई थी।
नहीं तो होता बड़ा हादसा
शनिवार शाम को विशेषज्ञों ने दीवार के नीचे के पत्थरों का दरकना महसूस किया। रविवार को बुर्ज की दीवार का काम रोक दिया और मजदूरों को पश्चिम बुर्ज की अन्य क्षतिग्रस्त दीवार के निर्माण पर लगा दिया, जिससे यहां कोई मजदूर मौजूद नहीं था, जिससे किसी की जान का नुकसान नहीं हुआ।
यहां बरती लापरवाही
विशेषज्ञों ने दुर्ग के बुर्ज को ढहने का सबसे बडा कारण बुर्ज निर्माण के दौरान फ ाउण्डेशन नहीं भरना बताया। उनके अनुसार दुर्ग के जीर्णोद्धार के दौरान लगभग सभी बुर्जों के तल पर तीन से चार फीट तक फ ाउण्डेशन भरे गए थे, लेकिन इस बुर्ज को बिना फाउण्डेशन भरे ही पुनर्निर्माण किया गया, जिससे दीवार लम्बाई पर पहुंची तो नीचे के पत्थर इतना भार नहीं सह सके और बुर्ज की दीवार ढह गई।
नहीं पहुंचे जिम्मेदार
दुर्ग के ढहने के बाद शाम तक कोई जिम्मेदार मौके पर नहीं पहुंचे और न ही हादसे के कारणों के संबंंध में कोई रिपोर्ट ही ली। लोगों ने दुर्ग की दीवार ढहने के कारणों का खुलासा करने और निर्माण में उपयोग ली जाने वाली सामग्री की जांच करने की मांग की।
इस सामग्री का किया उपयोग
जानकारों ने बताया कि दुर्ग के बुर्जों के पुनर्निर्माण में सीमेन्ट का उपयोग करने की मनाही थी, इसलिए निर्माण में पुराना चूना, बजरी, कंकरी पत्थर व ईंट के टुकड़ों का उपयोग किया गया।
पहले ही लगाए जा रहे थे कयास
फ लोदी के ऐतिहासिक दुर्ग के पश्चिमी छोर के बुर्ज के निर्माण के साथ ही जानकार बुर्ज के ढहने की आशंका जता रहे थे। अभी कुछ समय पहले ही इस संबंध में कुछ जागरूक नागरिकों ने किले की बुर्ज के निर्माण में उपयोग ली जा रही सामग्री पर सवाल उठाए थे और संबंधित ठेकेदार को उपयुक्त व सही सामग्री का उपयोग करने को कहा था, लेकिन उनकी बात को नहीं माना गया।
564 साल पुराना है दुर्ग का इतिहास
फलोदी में दुर्ग निर्माण का इतिहास करीब 564 साल पुराना है। इतिहासविदें के अनुसार दसवीं-ग्यारहवीं सदी में यहां विजयनगर उर्फ विजयपाटन नगर हुआ करता था, जो कालान्तर में नष्ट होने के बाद सन् 1515 में सिद्धूजी कल्ला यहां आए और उन्होंने यहां नगर बसाया जो फलवृद्धिका और फिर फलोदी नाम से विख्यात हो गया। किले का निर्माण कार्य 1536 ईस्वी में शुरू किया और 1573 ईस्वी में मुख्य दरवाजा बनने के बाद पूरा हुआ। फलोदी किले पर तीन राजाओं ने राज किया और हमेशा यह किला अभेद्य रहा। किले के प्रथम शासक राव हमीर थे, इसके बाद उनके पुत्र राव रामसिंह व इसके बाद डूंगरसिंह अंतिम शासक रहे। इसके बाद फलोदी को जोधपुर के शासक मालसिंह ने अपने कब्जे में ले लिया और फलोदी जोधपुर की रियासत बन गई।
घटिया निर्माण का किया गया है उपयोग
फलोदी के पश्चिमी छोर की उक्त दीवार के निर्माण कार्य शुरू होने के समय मैं मौके पर गया था और निर्माण कार्य में उपयोग ली जा रही सामग्री का निरीक्षण भी किया था, जो तय मापदण्डों के अनुसार सही नही थी, जिसका मैंने सुपरविजन कर रहे जिम्मेदार को मैन्सन भी करवाया था, लेकिन मेरी बात नहीं मानी गई। बुर्ज की दीवार गिरने के पीछे घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग करना है।
- महेश आचार्य, इतिहासविद्, फलोदी
फाउण्डेशन नहीं भरा इसलिए दरकी दीवार
हमें जिस तरह से निर्देश मिले थे, हमने उसी अनुसार काम किया है। उक्त बुर्ज की दीवार के आगे फ ाउण्डेशन नहीं भरे गए थे, जिससे निचले पत्थर ऊपर के पत्थरों का भार नहीं झेल पाए और दीवार ढह गई। हमारी मेहनत पर पानी फि र गया और करीब पांच से सात लाख का नुकसान हुआ है।
- युवराज, दुर्ग निर्माण ठेकेदार का सुपरवाइजर
दो महीने पहले दी थी सूचना
दो महीने पहले अधीक्षक पुरातत्व विभाग जोधपुर, बीएल मौर्य को इस सबन्ध में शिकायत की थी कि किले की दीवारों के निर्माण में घटिया सामग्र्री का उपयोग हो रहा है, जिस पर अधीक्षक मौर्य ने एइएन को इस संबन्ध में आवश्यक निर्देश भी दिए थे, लेकिन फि र भी सुधार नहीं हुआ तो फि र उन्हें नोटिस दिया गया, लेकिन फिर भी हालात नहीं सुधरे और परिणाम सामने है।
- हेमन्त थानवी, आरटीआई कार्यकर्ता।
Published on:
14 Feb 2021 11:21 pm
