
फलोदी. कुरजां का प्रवासन मार्ग और रिंगिंग कॉलर लगी कुरजां
दरअसल पिछले कुछ सालों से लगातार यहां मिल रहे रिगिंग कॉलर व सैटेलाइट टैग लगे पक्षियों से वैज्ञानिकों का अनुसंधान जारी है तथा पक्षियों के बारे में जानकारियां एकत्रित हो रही है। बुधवार को भी खीचन में विचरण कर रहे कुरजां में एक पक्षी के पैर पर सोलर सिस्टम सैटेलाइट व दूसरे पैर पर रिगिंग कॉलर देखा गया है। इस पक्षी के फोटोग्राफ को मंगोलिया, कजाकिस्तान, रूस आदि देशों के पक्षी वैज्ञानिकों को भेजा गया, लेकिन इस टैग की पहचान नहीं हो पाई है।
पक्षी प्रेमी सेवाराम माली ने बताया कि आज सुबह पक्षी चुग्गाघर में कुरजां के दाना लेते समय एक पक्षी के पैर में हरे रंग का रिगिंग कॉलर नजर आया। जिस पर १६७ कोड दर्ज है। साथ ही दूसरे पैर पर सफेद प्लास्टिक पर सोलर सिस्टम सैटेलाइट लटकता देखा गया है।
कई देशों से किया सम्पर्क, नहीं हुई पहचान-
पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दाऊलाल बोहरा ने बताया कि खीचन में कुरजां पर मिले सोलर सिस्टम टैग के फोटो को मंगोलिया, कजाकिस्तान, रूस आदि देशों के पक्षी वैज्ञानिकों को भेजा गया, लेकिन यहां के पक्षी वैज्ञानिकों से मिले जवाब से टैग की पहचान नहीं हो पाई है। उन्होंने बताया कि मंगोलिया, कजाकिस्तान, रूस आदि देशों के अब तक मिले रिगिंग कॉलर पर अंग्रेजी के शब्द के साथ नंबर दर्ज होते है। इस बार मिले रिङ्क्षगग कॉलर का रंग तो इन देशों के रिगिंग कॉलर से मिलता है, लेकिन टैगिंग का पैटर्न अलग है। कुछ अन्य देशों से भी इसको लेकर सम्पर्क किया जा रहा है। जल्द ही इसकी पहचान होने की संभावना है।
कुरजां के आने व जाने का अलग-अलग है मार्ग-
डॉ. बोहरा ने बताया कि जी बटबया द्वारा तैयार किए गए वर्ष २०१७ के डेमोसाइल क्रैन (कुरजां) के प्रवसन मार्ग मानचित्र से स्पष्ट होता है कि ये पक्षी मंगोलिया, चीन, तिब्बत, नेपाल, उत्तर प्रदेश से होते हुए राजस्थान के जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर व बाड़मेर जिलों में अलग-अलग स्थानों पर पहुंच जाते है। साथ ही पाली से होते हुए गांधीधाम आदि गुजरात के कई स्थानों पर पहुंचते है। फरवरी-मार्च में ग्रीष्म ऋतु की शुरूआत के साथ ही कुरजां राजस्थान व गुजरात से रवाना होकर पाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, क्रिगिस्तान, कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया पहुंचते है।
Published on:
30 Jan 2020 10:27 am
