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surrogacy news : जानिए सेरोगेसी डिलीवरी के नए नियम-कायदे

देश में औसत हर साल करीब 20 हजार होती हैं सेरोगेसी डिलीवरी

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surrogacy news : जानिए सेरोगेसी डिलीवरी के नए नियम-कायदे

surrogacy news : जानिए सेरोगेसी डिलीवरी के नए नियम-कायदे


जोधपुर.

प्रदेश का दूसरा बड़ा शहर जोधपुर में सेरोगेसी तकनीक आए डेढ़ दशक से ज्यादा समय बीत गया है, लेकिन आजतक जोधपुर में महज 11 ही सेरोगेसी डिलीवरी हुई हैं। जो दिल्ली,मुंबई व बेंगलूरु जैसे शहरों की त़ुलना में बहुत कम आंकड़ा है। हालांकि नि:संतान दंपतियों के लिए ये पद्धति वरदान है, उसके बावजूद जोधपुर में इसका चलन बहुत कम है। हमारे देश में हर साल 20 हजार बच्चे सेरोगेट चाइल्ड पैदा होते है। सेरोगेसी तकनीक से कई हॉलीवुड-बॉलीवुड के अभिनेता मां-बाप बन रहे हैं। बड़े शहरों व देशों में इसे फैशन के रूप में देखा जा रहा है। वहीं सेरोगेसी के नए कानूनों में अब केवल परिचितों को ही सेरोगेट मां बनाने का अधिकार आया है। इसको कॉमर्शियल बनाने पर रोक है। इस कारण अब नि:संतान दंपतियों को केवल अपने परिजनों से आस है।

जान लीजिए क्या हैं सेरोगेसी

आमतौर पर सेरोगेसी को किराए की कोख के नाम से भी जाना जाता है। इसमें संतान सुख से वंचित चल रहे लोग माता-पिता बन सकते है। इस प्रक्रिया में महिला किसी अन्य युगल के बच्चे को अपने कोख में पालती है और उसे जन्म देती है। इसे सेरोगेट मां कहा जाता है। इस गर्भ से पैदा बच्चा सेरोगेट कहा जाता है।

2021-2022 कानून में हुए ये बदलाव

उम्र 25 से 35 के बीच होनी चाहिए। महिला पूर्ण रूप से सेहतमंद होनी चाहिए। जो तमाम परिवर्तनों का सामना कर सके। आइसीएमआर के निर्देशानुसार वह जीवन में तीन बार से अधिक मां न बनी हो। कानून के हिसाब से सेरोगेट बनने वाली मां मेडिकल रिपोर्ट से फिट होनी चाहिए। सरोगेसी का सहारा लेने वाले कपल के पास प्रमाण होना चाहिए कि वे माता-पिता नहीं बन सकते। वहीं साल 2020 में सेरोगेसी रेग्यूलेशन बिल में कई सुधार किए गए। इसमें इच्छुक महिला को सेरोगेट मदर बनने की अनुमति दी गई, लेकिन बिल में कॉमर्शियल सेरोगेसी पर रोक लगा दी गई।

सेरोगेसी में भी कई प्रकार

सरोगेसी के प्रकार मुख्य रूप से विभिन्न बातों पर निर्भर करते हैं। लेकिन पहली ट्रेडिशनल सरोगेसी सामान्य प्रकार की होती है। जिसमें सरोगेट मदर के एग (अंडाणु) और उस पुरूष के स्पर्म (शुक्राणु) को मिलाया जाता है, इस मिश्रण को कृत्रिम तरीके से सरोगेट मदर के गर्भाशय में डाला जाता है। इस सरोगेसी के जन्मे बच्चे का सीधा संबंध बॉयोलॉजिकल पिता से होता है और उन दोनों का संबंध भावनात्मक और कानूनी रूप से अधिक मजबूत होता है। दूसरा एकल पुरूष (सिंगल मेन) से सरोगेट मदर के एग का उपयोग किया जाता है। वहीं जेस्टेशनल सरोगेसी भी होती है। यह ऐसी सरोगेसी होती है, जिसमें उस पुरूष और महिला के क्रमश: स्पर्म (शुक्राणु) और एग (अंडाणु) को टेस्ट ट्यूब तरीके से मिलाकर भ्रूण (एम्ब्रो) का निर्माण किया जाता है, जो अपनी संतान चाहते हैं, उन्हें कृत्रिम तरीके से सरोगेट मदर के गर्भाशय में डाला जाता है। इस प्रक्रिया से जन्में बच्चे का संबंध सरोगेट मदर की बजाय उसके जैविक मां-बाप (बायोलॉजिकल पैरेंट्स) से होता है। इसे मुख्य रूप से इन विर्टी फर्टिलाइजेशन (IVF) की तकनीक से किया जाता है
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केस-़1

शांता के जीवन में आई खुशियां

जोधपुर निवासी शांता ( परिवर्तित नाम ) की शादी साल 2005 में हुई। शादी के आठ साल होने के बाद तक भी वे मां नहीं बनी। उनके गर्भाशय में समस्या होने के कारण गर्भधारण नहीं हो सकता था। लेकिन डॉक्टर ने बताया कि वे सरोगेसी प्रक्रिया की मदद से संतान प्राप्त कर सकती है। यहां नियम-कायदे समझ में सेरोगेसी चाइल्ड की मां बनी।
केस-2

सरोगेसी से दिया नाती को जन्म बिना यूट्रस के पैदा हुई थी महिला
महिला ने अपने नाती को यानी बेटी के बेटे को जन्म दिया है।।अपनी बेटी के लिए सरोगेट मदर बनीं. दरअसल मेघा ( परिवर्तित नाम ) को 17 साल की उम्र में मेयर-रोकितांस्की-मिस्टर-हॉसर सिंड्रोम का पता चला था. ये एक तरह का डिसऑर्डर होता है जिसमें बच्ची बिना यूट्रस के ही जन्म लेती है. इसकी वजह से वो कभी मां नहीं बन पाती है। मेघा की मां को पता था कि उनकी बेटी कभी मां नहीं बन सकती। इसके बाद उन्होंने अपनी बेटी के लिए मां बनने का फैसला किया और मेघा का मां बनने का सपना पूरा किया।

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सेरोगेसी वरदान है
नि:संतान दंपतियों के लिए सेरोगेसी वरदान है। वैसे सरोगेसी प्रक्रिया की शुरूआत नि: संतानता विशेषज्ञ से मिलने के साथ ही हो जाती है। वहां पर उनके नि:संतान होने के कारण का पता लगाया जाता है, जिसके लिए पुरूष और महिला दोनों के कुछ टेस्ट किए जाते हैं। अगर उन टेस्टों में इस बात की पुष्टि होती है कि उस महिला के यूट्रस में कोई ऐसी कमी है, जो किसी दवाई या सर्जरी से ठीक नहीं की जा सकती और उसके कारणवश वह महिला कभी गर्भाधरण नहीं कर सकती, तब डॉक्टर उन्हें सरोगेसी कराने की सलाह देते हैं। जिस तरह से हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी तरह से इस प्रक्रिया के भी दो पहलू- लाभ और हानि है, जिसके बारे में जानना उतना ही जरूरी है,जितने इस पूरी प्रक्रिया के बारे में जानना। ये कार्य अच्छे डॉक्टर्स की सलाह बगैर संभव नहीं है।

- डॉ. संजय मकवाना, वरिष्ठ निःसंतानता एवं परखनली शिशु चिकित्सा विशेषज्ञ


इलाज महंगा और समाज का डर
सेरोगेसी तकनीक में इलाज बहुत महंगा होता है। इसे हर कोई नहीं अपना सकता। क्योंकि कई महंगी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद दंपति को इसमें संतान सुख मिलता है। कई पेचिदगियों से गुजरे हुए दंपती को कई बार समाज का भी डर सताता है। इस कारण अभी तक जोधपुर में इसका प्रचलन नहीं है। हालांकि हो सकता हैं कि आने वाले समय में इसका प्रचलन बढ़ेगा।

- डॉ. सीमा शर्मा, स्त्री-प्रसूति एवं नि:संतानता रोग विशेषज्ञ

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