
satyenarayan
के के बिड़ला फाउंडेशन की ओर से यह एक दुनिया रिपोर्ताज संग्रह पर शीर्ष सशक्त हस्ताक्षर कथाकार, रिपोर्ताजकार डॉ. सत्यनारायण को बिहारी पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गई है। पेश है उनसे साक्षात्कार :
आपके लिए यह पुरस्कार कितना महत्व रखता है ?
डॉ. सत्यनारायण- खुशी तो होती है, पुरस्कार प्रसिद्धि तो देता ही है। इससे रिकगनिशन मिलता है। आपके लिखे हुए को स्वीकार्यता मिलती है, लेकिन यह एक नई चुनौती होती है। यानि जो आपने अब तक लिखा है, उससे बेहतर और आगे लिखो।
आप अपने शुरुआती दौर और आज के लेखन में कितना अंतर पाते हैं?
डॉ. सत्यनारायण - मैंने कहानियों से लेखन शुरू किया। मुझे लगा कि मैं जिन लोगों के बीच रहता हूं,मैंने उनको नजर में रखा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के बीच लेखन अधिक चुनौतीपूर्ण है। इस दौर में पाठकों की चुनौती बनाए रखना महत्वपूर्ण है। साहित्य के इतर विधाओं के कारण साहित्य अधिक लोकप्रिय हो रहा है। अगर मैं मेरी बात करूं तो कहानियों और रिपोर्ताज की किताबों को पाठकों ने हाथोंहाथ लिया है।
आपको कविता, कहानी और रिपोर्ताज में से क्या ज्यादा अच्छा लगता है?
डॉ. सत्यनारायण-अच्छे की बात नहीं है। सभी विधाएं अच्छी हैं। कभी कहानी, कभी डायरी तो कभी कविता भी कहता हूं,लेकिन मैं खानाबदोश लोगों के बीच अधिक रहा, इसलिए रिपोर्ताज ज्यादा लिखे हैं। मैं उन लोगों के ज्यादा नजदीक हूं। मैंने कहीं लिखा था- मेरे बीच एक बेचैन आत्मा रहती है, जो मुझे एक जगह भी टिकने नहीं देती, इसलिए निरंतर भटकता रहता हूं।
अभी किस पर काम कर रहे हैं? अगली किताब क्या आ रही है?
डॉ. सत्यनारायण - मैं हाशिये के लोगों रैबारी, बावरी, कालबेलिया, कंजर, बंजारा, नट व सांसी आदि समाजों के लोगों के बीच काम कर रहा हूं। ये मेन स्ट्रीम में कहीं नहीं हैं। राजनीति, साहित्य और समाज में इन्हें कहीं जगह नहीं मिलती। बस थोड़ा बहुत कहीं जिक्र होता है। ये अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन दिनों में अपनी आत्म कथा पर काम कर रहा हूं। इसका एक अंश कुरजां में छपा था। दस साल पहले सोचा था,अब समय मिला है तो लिख रहा हूं।
आज के साहित्य और साहित्यकार के लिए आप क्या कहेंगे?
डॉ. सत्यनारायण -किसी भी संवेदनशील लेखक के लिए यह एक कठिन समय है, जहां कोई विचारधारा नहीं है, लेखकों का कोई संगठन नहीं है। सबकुछ बिखरा बिखरा है। हम जिस समय में जी रहे हैं, उसके लिए अल्बैर कामू की एक बात याद आती है कि हमें यानि लेखक को हमेशा उन लोगों की तरफ से बोलना चाहिए, जो अपने लिए नहीं बोल सकते। विजयदान देथा बिज्जी से हुई बातचीत का एक वाक्य याद आता है-पढ़ो मण भर, लिखो कण भर। नये लेखक को खूब पढऩा चाहिए।
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