बस्तियों में परेशानी, विकास ने झांका तक नहीं

- शहरी विस्तार का साइड इफेक्ट

- नई कॉलोनियों में रहने वाले दशकों से इंतजार में

By: Avinash Kewaliya

Published: 14 Sep 2021, 01:08 AM IST

जोधपुर। ये कुछ उदाहरण है जो कि शहर विस्तार और विकास में बड़ी खाई बताते हैं। समय की मांग के अनुरूप परकोटा शहर के मकान छोटे पडऩे लगे तो स्वाभाविक बात है कि बाहरी क्षेत्र में नई बसी कॉलोनियों में मकान बनाए। लेकिन जब इन कॉलोनियों में भी सुविधाएं न मिले तो हताश होते हैं।

सरकारी कॉलोनियां में बसावट नहीं और निजी में सुविधाएं

सरकारी कॉलोनियां जैसे विवेक विहार, महात्मा गांधी आवसीय योजना में स्थानीय निकाय सुविधाएं तो विकसित कर देता है लेकिन वहां बसावट नहीं हो पाती। दूसरी ओर जिन निजी कॉलोनियों में बसावट हो रही है, वहां सुविधाएं नहीं है। इसका एक कारण या तो वे कॉलोनियां रेरा से अप्रूव नहीं है या फिर उन्होंने अपना प्लान ही पूरी तरह से पास नहीं करवाया है। ऐसे में शहरवासी जानकारी के अभाव में ऐसी कॉलोनियों में भूखंड लेने के बाद परेशानी झेलते हैं।

शहरी विस्तार में कुछ ऐसी समस्याएं
- अधिकांश बस्तियों में सड़कों की सुविधाएं पुख्ता नहीं है। यदि किसी डवलपर ने एक बार सड़कें अच्छी बना कर दे भी दी तो दो-तीन साल में वे जवाब दे जाती है और फिर इस और कोई ध्यान तक नहीं देता।

- पानी कनेक्शन या तो अधिकांश बस्तियों में नहीं है, यदि है तो उनमें अच्छे दबाव से पानी नहीं आने की समस्या रहती है।
- स्ट्रीट लाइट भी नई बस्तियों में एक बड़ी समस्या है।

- परिवहन के साधन हर कॉलोनी तक नहीं है। जो कॉलोनियां मुख्य सड़क पर बनी है वहां तो सार्वजनिक परिवहन के लिए बसें व टेम्पो मिल जाएंगे। लेकिन कई कॉलोनियां मुख्य सड़क से 3 से 5 किमी अंदर बस रही है, वहां तक साधन ही नहीं है।

कैसे हो सकता है सुधार
- 600 सिटी बसों से सार्वजनिक परिवहन व इनका दायरा व संख्या बढ़ानी होगी। नए रूट भी तय करने होंगे।

- बंद पड़ी बीआरटीएस बस सुविधा फिर से शुरू करनी होगी।
- 31 मुख्य सड़कों की चौड़ाई निर्धारित की गई है, मास्टर प्लान में उसे लागू किया जाना चाहिए।

- जोधपुर जिले की सप्लाई के लिए 240 क्यूसेक पानी मिल रहा है। इसे बढ़ाकर 350 क्सूयेक करना होगा। जिससे हर कॉलोनी तक पानी पहुंचाया जा सके।
- अवैध कॉलोनियों पर कार्रवाई और वैध कॉलोनियों पर भी रेरा की निगरानी जरूरी है।

केस 1
लक्ष्मण शर्मा अभी बनाड क्षेत्र की नई कॉलोनी में रहते हैं। कोई 7-8 बरस हो चुके हैं इन्हें शहर से यहां शिफ्ट हुए। हर महीने ये दो हजार रुपए तो सिर्फ पानी के लिए खर्च करते हैं, क्योंकि पानी की पाइप लाइन है नहीं। टैंकर हर 4 से 5 दिन में मंगवाना पड़ता है। पहले शहर में 48 घंटे में पानी मिल जाता था।

केस 2
बनाड़ क्षेत्र के महादेव नगर में सुशीला देवी का परिवार भी पहले परकोटा शहर में ही रहता था। अभी तीन-चार साल पहले ही यहां शिफ्ट हुए। इस उम्मीद में कि बाहर बड़ा मकान और सुकून से रहेंगे, लेकिन इनके घर में भी पानी की समस्या तो है ही सड़क तक नहीं है। वे बताती हैं कि शहर में घर भले छोटा था लेकिन सुविधाएं तो सारी मिल जाती थी।

Avinash Kewaliya
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