
मानवीय स्टोरी
जोधपुर. ये रोते हैं, लेकिन बताते नहीं। इनमें दिमागी खामियां अननिगत हैं, लेकिन दिल तो आज भी अपनों के लिए धड़कता है। सालों से कई ऐसे मानसिक रोगी भर्ती हैं, जिन्हें आज तक कोई रिश्तेदार घर से लेने या मिलने नहीं आया। ये अक्सर अपने वार्ड में हर किसी को आता देख समझते हैं कि आज कोई अपना आया। ये व्यथा है संभाग के सबसे बड़े मथुरादास माथुर अस्पताल में भर्ती मानसिक रोगियों की।
एमडीएम अस्पताल के मनोविकार विभाग में 7 पुरुष और 7 ही महिला मानसिक रोगी भर्ती हैं, जिन्हें अभी तक घर से कोई लेने नहीं आया। इन्हें लावारिस भी कहा जा सकता है। हालांकि ये अब घर जाने लायक हैं, लेकिन इन्हें आज तक कोई लेने नहीं आया। ऐसे में सेहत में सुधार आने के बाद सरकार के सहयोग से अन्यत्र जगह शिफ्ट भी किया जाता है।
इन मानसिक रोगियों में ज्यादातर लावारिस हालत में मिले थे। जिन्हें एनजीओ या सरकारी हस्तक्षेप के बाद अस्पताल लाया गया। कई मानसिक रोगी वार्डों में हरेक आने-जाने वालों परिजनों को टकटकी लगाकर देखते रहते हैं। इन्हें ऐसा लगता हैं कि काश, इनमें कोई अपना दिख जाए।
ज्यादातर सिजोफ्रेनिया व एमडीपी के मरीज
ज्यादातर मानसिक रोगी सिजोफ्रेनिया व एमडीपी के होते है। मनोविकार विभाग के वरिष्ठ आचार्य डॉ. जीडी कूलवाल बताते हैं कि सिजोफ्रेनिया भी एक घातक बीमारी है। इसमें आदमी को ज्यादातर डर व डरावने साए दिखते हैं। दुनिया की एक फीसदी आबादी सिजोफ्रेनिया की शिकार है। एमडीपी के मरीज अक्सर कभी उदास होते है तो कभी तेज हो जाते है। इनमें उदासी और तेजी के दौर चलते रहते हैं।
अब ये रोगी नहीं, परिवार का हिस्सा
डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज में मनोरोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. संजय गहलोत का कहना हैं कि ऐसे मरीज कहीं है, जिनका कोई अपना नहीं है। इनके माता-पिता चल बसे, बाकी के रिश्तेदार नहीं रख रहे। भर्ती मरीज तो अब उनके और स्टाफ के परिवार का हिस्सा बन चुके हैं। इनके सुख-दुख में पूरा स्टाफ शामिल रहता है। इनको सेवाभावी संस्थाओं में थोड़ा ठीक होने के बाद भेजते हैं। ये मरीज धीरे-धीरे अपने अस्तित्व में भी आते है।
Published on:
08 Sept 2021 10:56 pm
