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Wild Life: पहले से खतरे में, अब भूख-प्यास से जीवन संकट में

Wild Life पर मारवाड़ की भीषण गर्मी कहर बन रही है। पहले से विलुप्त होने के कगार पर पहुंचे Blackbuck, हरिण व अन्य वन्यजीवों के जीवन पर भूख-प्यास से संकट आ खड़ा हुआ है। सरकार ने इनके चारे-पानी के लिए अभी तक बजट भी जारी नहीं किया है तो गांवों में इनकी जिंदगी पर्यावरण प्रेमी ग्रामीणों के भरोसे ही टिक गई है। कई वन्यजीव भूख-प्यास से तड़प कर दम तोड़ने लगे हैं। वन्यजीव इसी तरह बे-मौत मरते रहे तो Wild Life Tourism खत्म हो जाएगा
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Wild Life: पहले से खतरे में, अब भूख-प्यास से जीवन संकट में

Wild Life: पहले से खतरे में, अब भूख-प्यास से जीवन संकट में

जोधपुर. कृषि योग्य भूमि में विस्तार के चलते आम काश्तकार खेतों को सुरक्षित करवाने के लिए कंटीली तारों की बाड़ भूखे प्यासे हरिणों के लिए मौत का फरमान साबित होती जा रही है। हर साल करीब एक हजार से अधिक चिंकारे, काले हरिण व रोजड़े चारे पानी की तलाश में घायल होते हैं, जिनमें 60 से 65 प्रतिशत से अधिक की मौत हो जाती है। चौतरफा समस्याओं से घिरते जा रहे वन्यजीवों के संरक्षण के लिए प्रत्येक तहसील स्तर पर राजस्व गांवों में खाली पड़ी गोचर भूमि क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण शेल्टर हाउस विकसित कर उचित सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान कर भूखे प्यासे वन्यजीवों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है । वन

विभाग में दर्ज वन्यजीवों की मौत के पिछले सिर्फ तीन साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो कुल 4 हजार 416 वन्यजीवों की मौत हुई है। जबकि हकीकत में वन्यजीवों की मौत के आंकड़े इससे कहीं ज्यादा है। पर्यावरण संतुलन और Eco Tourism को बढ़ावा देने के लिए पर्यावरण प्रेमियों, वनविभाग, जिला प्रशासन और क्षेत्रीय पंचायत समिति के अलावा सरकार को समय पर चेतने और सहयोग की जरूरत है अन्यथा वन्यजीवों का वजूद ही पूरी तरह खत्म होने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

वनविभाग के आंकड़ों में वन्यजीवों की मौत

वर्ष ----------- रेस्क्यू के दौरान मौत----- शिकारियों के हाथों मौत

2019-----------1767-------------------17

2020-----------1239-------------------23

2021-----------1358--------------------22

ढाई हजार हनुमान लंगूर

शहर के आस - पास करीब ढाई हजार से अधिक हनुमान लंगूर हैं । शहर के मंडोर, दईजर, बेरीगंगा, निम्बा-निम्बड़ी, बालसमंद, चोखा, भीम भड़क, बीजोलाई, सिद्धनाथ, चौपासनी, कदम्ब खंडी, भद्रेशिया, अरना - झरना व बड़ली क्षेत्र में करीब 50 हनुमान लंगूरों को टोले प्राकृतिक जलाशयों पर ही निर्भर हैं, लेकिन इनके प्राकृतवास में अंधाधुंध खनन से कई तालाब सूख चुके है। ऐसे में हनुमान लंगूरों को मजबूरन रिहायशी क्षेत्रों में आकर प्यास बुझानी पड़ती है।

25 हजार से अधिक नीलगाय

चारा पानी की तलाश में सड़कों पर विचरण करते समय वन्यजीव नील गाय (बोसेपेफस ट्रेगोकेमेलस ) के तेज दौडऩे से वाहन दुर्घटना अथवा बड़ी जन हानि भी हो सकती है। हर साल शिकार, वाहन दुर्घटनाओं, सूखे कुएं में गिर जाने तथा खेतों की तारबंदी में फंस कर करीब 600 से अधिक रोजड़े जान गंवा देते है। समूचे एशिया में आकार में सबसे बड़े एंटीलोप प्रजाति के जोधपुर शहर के आसपास व जिले के विभिन्न क्षेत्रों में करीब 20 से 25 हजार है।

बारिश भी बनती है बैरन

गर्मी और तपिश के साथ हर साल बारिश के मौसम में 700 से 800 वन्यजीव घायल होते है। घायल होने का प्रमुख कारण बारिश के मौसम में नमभूमि पर दौड़ने में असमर्थ चिंकारे और काले हरिणों पर श्वान हमला करने से गंभीर घायल हो जाते हैं और समय पर उपचार नहीं मिलने से मौत हो जाती है।

लूणी नदी का दोहन

लूणी नदी के आसपास विचरण करने वाले हजारों वन्यजीव अंधाधुंध बजरी खनन के कारण पाली जिले में पलायन कर चुके है। बचे कुचे वन्यजीव अवैध क्रॅशर और शहरी विकास और विस्तार की वजह से अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है।

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