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पानी की बचत में महिलाओं का महत्वपूर्ण है योगदान, मरुधरा के लोग जानते हैं पानी का मोल

राजस्थानी की प्रख्यात साहित्यकार डॉ. किरण राजपुरोहित नितिला का कहना है कि पानी की बचत करने में महिलाएं अहम किरदार निभा सकती हैं।

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Harshwardhan Singh Bhati

Apr 22, 2017

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जल ही जीवन है। जल है तो कल है। जल है तो सबकुछ है। पानी की बचत करने में महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण है। मरुधरा के लोग पानी का मोल ज्यादा जानते हैं। राजस्थानी की प्रख्यात साहित्यकार डॉ. किरण राजपुरोहित नितिला का कहना है कि पानी की बचत करने में महिलाएं अहम किरदार निभा सकती हैं। उन्होंने पत्रिका से एक साक्षात्कार में कहा कि अपने जोधपुर के जलस्रोत ही जीवन रेखा हैं। वे महिलाओं से बात कह रही हैं। उन्हीं के शब्दों में :

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सखी! तुम्हें भी इस आकरी गरमी की तपिश और लू के थपेड़ों ने परेशान कर रखा होगा ना! ये हमारे बीच समय से पहले ही आ पहुंची। हमने ही इसे न्यूता दिया है। हमें फ गत आधुनिक बनना ही याद रहा इस धरा के प्रति उत्तरदायित्व को हमने बिसरा दिया। हम ने पृथ्वी के ग्रहों पर भी अपना अधिकार मान लिया। जीव जिनावर को उनके मौलिक अधिकारों से अपदस्थ करते हुए अपने कत्र्तव्य भूल कर अधिकार लेकर आत्ममुग्ध हो गये। प्रकृति के ये तीखे तेवर हमें चेतावनी है।

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सजा है। जितना हम तेजी से भाग रहे हैं समस्याएं हमें साबुत ही निगलने को तैयार पास आती जा रही हैं।सखी एक बात कहूं! किसी भी बस्ती या गांव व शहर को बसाने के लिए जलस्रोत मुख्य आधार होता है इसी कारण जितनी भी सभ्यताएं हैं सब नदी किनारे विकसित हुई हैं और जब पूर्ण विकसित होकर वे आत्ममुग्ध होती है तो कोई जलजला उन्हें नेस्तनाबूद कर देता है। तभी तो ये सर्वकालिक नहीं होती। सैकड़ों सालों की सभ्यताएं अवशेष बन कर रह जाती हैं। इसी तरह नगर ग्राम भी भूमिगत पानी के मद्देनजर बसाए जाते हैं।

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जल के लिए खेचल

सखी! हमारे जोधाणे को भी भले ही अकाल का श्राप रहा हो फि र भी यहां के राजे,महाराजे, रानियों और पासवानों ने जल के लिए खेचल की है, वो सराहनीय है। समय -समय पर कुंआ,बेरे, बावड़ी,झालरे,तालाब और झील बनवाकर परकोटेवासियों को सर्मिर्पत किए हैं। तापी बावड़ी तूरजी का झालरा, गुलाब सागर और बाईजी का तालाब आदि संख्या बड़ी है। ये बड़ी संख्या भी तो बिन पानी सब सून सिद्ध करता है। यही तो जीवन रेखा है।

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यही बात राजा-प्रजा के सम्बंध को मधुर और चिरस्थायी बनाती है, पर हमने अपने पारंपरिक स्रोत की जो गत बनाई है उसे देखकर शर्म से सिर नीचा हो जाता है। आजादी के बाद तकइनका अमृत समान पानी पीते रहे है। और ज्यूं-ज्यूं सरकारी नल आते गए, हम इनका महत्व भूलते गए। कितने स्वार्थी हैं हम ! जिस प्रकार बुजुर्गों को दरकिनार करते हुए नई पीढ़ी आधुनिकता में मगन हुई तो वृद्धाश्रम ने उन्हें सांत्वना दी, पर इन पेयजल स्रोतों को तो हमने यूं ही कूड़े बराबर कर के रख दिया है, बल्कि कूडे़दान बनाने में भी संकोच न किया। इन्हें कौन सांत्वना देगा? कौन बचाएगा? किसी समय नगर का जीवन अधार थे और अब ये खुद अंतिम सांसें गिन रहे हैं।

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शरणागत वल्सल मारवाड़

मारवाड़ तो शरणागत वत्सल है फि र हम इतने संकीर्ण क्यूं होते चले गए? भाषा साहित्य और कला से किनारा करता समाज संवेदनहीन होता जा रहा है। देश के लिए मायड़ भौम के लिए हंसते-हंसते खेत रहने वाले जोधा और देश के लिये अपनी भाषा को भी सहर्ष होम करने वाले हम मरुधरावासी जीवनदायी स्रोतों के प्रति हम बेरुख कैसे हो गए? आंध्र और मराठवाड़ा के त्राहि वाले दरसाव हम भूल तो नहीं गए हैं। हमारे यहां भी गांव- ढाणियों में भी पानी के लिए आज भी ऐसी त्रासदी उनकी नियति है। सावचेत न हुए तो हम भी उसी त्रासदी से गुजरने वाले हैं। मरुस्थलवासी पानी को मोती से मूंगा मानकर सहेजते आए हैं। सखी! वह परंपरा कायम रखना है।

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