
जोधपुरी बंधेज लहंगा और साड़ी
जयकुमार भाटी/जोधपुर। देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाली जोधपुरी बंधेज कला कपड़े को बांधने और रंगने की एक राजस्थानी कला है। इस कला में सूती, रेशम, ऊनी या सिंथेटिक सामग्री के कपड़ों का उपयोग होता है। ऐसे में राजस्थान की इस पारंपरिक कला जोधपुरी बंधेज को राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की और से भौगोलिक संकेतक (जियोग्राफिकल इंडिकेशन- जीआई) टैग प्रदान किया गया। नाबार्ड की और से विलुप्त हो रही कलाओं को जीवित रखने के लिए उत्पादों के जीआई पंजीकरण परियोजना की सहायता प्रदान की गई है। बंधेज के हॉलसेल विक्रेता लक्ष्मण कल्याणी ने बताया कि जोधपुर बंधेज से तैयार साड़ी, दुपट्टा, लहंगा, स्कर्ट और स्कार्फ की देशभर में मांग हैं। बंधेज के कपड़ों का विदेशों में निर्यात होने से देश-विदशे में सालाना लगभग पचास करोड़ से अ धिक का व्यापार भी हो रहा हैं। ऐसे में जीआई टैग मिलने से इस कला से जुडें लोगों के साथ व्यापारियों को भी अब इसका लाभ मिलने लगेगा।
जीआई टैग का फायदा
जोधपुर बंधेज को जीआई टैग मिलने से इस पारंपरिक कला की प्रामाणिकता और विशिष्टता को पहचान मिलेगी। इस कला को नकल से बचाया जा सकेगा। बंधेज कला से जुडे कारीगरों की आने वाली पीढ़ियों को अपनी प्रतिष्ठित पहचान मिलेगी। वहीं अपने उत्पाद की अलग पहचान बनाने, ब्रांड का निर्माण करने, स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने, पर्यटन और बंधेज के व्यवसाय को बढ़ावा देने और जैव विविधता का संरक्षण करने में जीआई टैग की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। इससे उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार होगा, बाजार तक पहुंच बढ़ेगी, कारीगरों में जागरूकता पैदा होगी और उत्पादकों की क्षमताओं के स्तर में भी वृद्धि होगी।
विश्वस्तर पर नई पहचान मिलेगी
नाबार्ड के सहयोग से भौगोलिक संकेतक प्राप्त जोधपुरी बंधेज को जीआई प्रमाण पत्र जारी किया गया। यह प्रमाण पत्र बीकानेर के अमृता हाट में 3 से 10 अक्टूबर 2023 के दौरान आयोजित मेले में जोधपुरी बंधेज सोसायटी के मोहम्मद आसिफ को दिया गया। जीआई टैग मिलने से जोधपुर की बंधेज को विश्वस्तर पर नई पहचान मिलेगी और यहां के हस्तशिल्पियों को निश्चित रूप से लाभ होगा।
मनीष मण्डा, जिला विकास प्रबंधक, नाबार्ड जोधपुर
Published on:
29 Jan 2024 11:40 pm
