
वर्षों से होती आ रही यहां सिर कटे मुर्गे की पूजा, अनोखी है इसकी दास्तां
पत्रिका न्यूज नेटवर्क
कानपुर देहात. आमतौर पर आपने बहुत से देवी मंदिरों (Devi Temple) के बारे में सुना होगा। लोग मान्यताओं के अनुसार वहां अपनी आस्था रखते हैं। लेकिन कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र के लाला भगत स्थित देवी मंदिर की मान्यता अनोखी है। इस देवगांव में स्थित देवी मंदिर में स्थापित सिर कटे मुर्गे की पूजा करने की प्रथा वर्षों से चली आ रही है। लोग इसे कौमारी देवी के मंदिर के नाम से भी जानते हैं। वर्ष भर यहां लोग दर्शन के लिए आते हैं। खासतौर पर नवरात्रि (Navratri) में दूर दराज के लोग यहां मनौती मांगने आते हैं। इस सिर कटे मुर्गे के पीछे लोगों की अलग अलग मान्यताएं है। जो लोगों के लिए चर्चा का विषय रहता है। कहा जाता है कि इस मंदिर के दर्शन मात्र से ही सभी मनोकामना पूरी होती है। लोगों का मानना है कि इस खेड़े के नीचे कोई पुराना महल दफन है। कन्नौज राजघराने के इतिहास व मां कौमारी देवी की अनुकम्पा के कारण यह मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
इस मान्यता पर विख्यात है ये मंदिर
बुजुर्गो की मान्यता है कि कन्नौज के राजा रतीभान की पुत्रवधू के रात्रिबेला में सोने के समय कौमारी देवी के मुर्गे की बांग और परहल देवी मंदिर में जलती विशाल ज्योति उनके सोने में खलल डालती थी। रात को जब वो सोने के लिए कक्ष में जाति थीं तो 12 बजे कौमारी देवी का मुर्गा बांग देता था। जिससे महारानी सो नहीं पाती थी। इधर रतीभान के पुत्र लाखन महोबा पर चढ़ाई करने की तैयारी कर रहे थे। जिसके लिये जागन आल्हा, ऊदल को मनाने गये। रानी पदमा को पता चला कि, लाखन युद्ध में जा रहे है। तो उन्होंने लाखन से कहा कि, आप तब जायेंगे जब कौमारी के इस मुर्गे को मारकर परहुल देवी की ज्योति बुझा देंगे। क्योंकि आप चले जायेंगे, तो ये मुर्गे की बांग व ये अखंड ज्योति की रोशनी मुझे रात को सोने नहीं देगी। यह सुनकर लाखन ऊदल, आल्हा, जागन, इंदल को लेकर रसूलाबाद के लाला भगत पहुंचे। जहां उन्होंने मुर्गे का सिर कलम कर दिया और वापस लौट गये और जाने की तैयारी करने लगे। तो रानी ने फिर रास्ता रोक लिया और बोली जब तक वह ज्योति नहीं बुझेगी। मुझे नींद नहीं आयेगी। इस पर परहुल पहुंचकर अखंड ज्योति को बुझाकर रिंद नदी में फेंक दिया गया।
सिर कटे मुर्गे की मान्यता जानिए
लोगों की मान्यता है कि, पहले इस स्थान पर जंगल था। गुप्तकाल के पुजारी रामस्वरूप अक्सर उस स्थान से गुजरा करते थे और उस मंदिर को जर्जर देख विचलित होते थे। उन्होंने उस मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया। उसमें विधि विधान पूजन कर मुर्गे की प्रतिमा स्थापित कराई और उन्होंने पूजा अर्चना प्रारम्भ कर दी। वह रोजाना वहां आकर पूजा करने लगे। एक दिन अचानक मंदिर में पूजा करते समय उन्हें मुर्गे की बांग सुनाई दी। आंख खोलने पर वह इधर उधर देखने लगे और सोचा इस जंगल में तो कोई मुर्गा नहीं है। फिर उन्होंने पत्थर का मुर्गा देखा तो उसके सिर से खून निकल रहा था। यह नजारा देख वह अचंम्भित हो गये। और पुजारी उस मुर्गे को नमन करते हुये जमीन पर लेट गये। तब से लेकर आज तक इस मंदिर में लोग सिर कटे पत्थर के मुर्गे की पूजा करते हैं।
क्या कहते हैं मंदिर के पुजारी
पुजारी रामस्वरूप की पांचवी पीढ़ी आज भी मंदिर की सेवा में लगे हुये हैं। पुजारी अशोक कुमार सैनी जी का कहना है कि, एतिहासिक मान्यताओं के चलते इस मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। नवरात्रि में लोग मनौती पूरी होने पर घंटे चढ़ाने आते हैं। मुंडन कराने की प्रथा भी है। इस मंदिर मे आकर दर्शन मात्र से ही लोगों की मुरादे पूरी हो जाती हैं।
Published on:
14 Apr 2021 07:55 pm
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