डेरापुर निवासी पंडित कनौजीलाल मिश्रा ने इस मंदिर का निर्माण सन 1894 में करवाया था। उस वक्त वह फैजाबाद जिले के असिस्टेंट कमिश्नर पद पर तैनात थे। उस जमाने मे जमींदारी की प्रथा थी। एक दिन कनौजीलाल घर आए हुए थे। रात को सोते हुए उन्हें सपने में दिखाई दिया कि उनके घर से कुछ दूरी पर जंगल में भगवान शिव का शिवलिंग है और उस पर चरवाहे खुरपी रेतने का काम कर रहे हैं। खुरपी की रगड़ लगने से शिवलिंग से खून बह रहा है। सुबह होते ही कनौजीलाल ने उस जंगल की तरफ रुख किया और वहां पहुंच गए। सपने में जो जगह दिखाई पडी थी, ठीक उसी जगह पर एक पत्थर दिखा, जिससे खून निकल रहा था। इसके बाद उन्होंने वहां खुदाई शुरू कराई तो एक विशाल शिवलिंग दिखाई दिया। लेकिन जैसे-जैसे खुदाई हुयी तो शिवलिंग का स्वरूप देख लोग सन्न रह गए। दरअसल इस शिवलिंग के साथ एक मजार भी थी, जिसमें खुदाई करके लोग शिवलिंग व मजार का अंत देखना चाहते थे, लेकिन काफी खुदाई के बाद भी लोगों को प्रतिमा का दूसरा छोर नहीं मिला। थक हारकर कनौजीलाल मिश्रा ने हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए यहां कपालेश्वर मंदिर की स्थापना करा दी। इसके बाद दोनों