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शिवलिंग और सैयद मजार एक साथ, हिंदू-मुस्लिम दोनों करते है सजदा

जनपद की तहसील डेरापुर कस्बे से महज 2 किलोमीटर दूरी पर स्थित कपालेश्वर मदिर की अनोखी दास्तां है। जिसे सुनकर व देखकर आप दंग रह जाएंगे। कौमी एकता का ऐसा अनोखा संगम जो अपने आप में अनोखा होने के साथ दुनिया में इकलौता भी है।

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Nitin Srivastva

Jul 25, 2017

kanpur

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अरविन्द वर्मा

कानपुर देहात. हिंदू मुस्लिम एकता की आपने आज तक तमाम मिशालें देखी होंगी और ऐसी कई कहानियां सुनी होंगी, लेकिन जनपद की तहसील डेरापुर कस्बे से महज 2 किलोमीटर दूरी पर स्थित कपालेश्वर मदिर की अनोखी दास्तां है। जिसे सुनकर व देखकर आप दंग रह जाएंगे। कौमी एकता का ऐसा अनोखा संगम जो अपने आप में अनोखा होने के साथ दुनिया में इकलौता भी है। लोग कहते हैं ईश्वर एक है और वह सभी को यही रास्ता दिखाता है कि सभी आपसी प्रेम से रहें। कई बार आपने हिंदुओं की पूजा व मुस्लिमों की इबादत एक जगह जरूर देखी होगी। लेकिन कभी सैयद बाबा और भगवान शिव का आपसी प्रेम देखा है। ऐसा ही अलौकिक प्रेम का संदेश देता है 1894 में स्थापित ये कपालेश्वर मंदिर। जिसे कपालेश्वर व पीर पहलवान के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें सैयद बाबा को पीर व शिव को पहलवान कहा जाता है।


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सदियों से दो बाबाओं का वास

जब आप मंदिर के आस पास का नजारा देखेंगे, तो ये नजारा आपको बीहड़ से कम नहीं लगेगा। लेकिन ये कोई ऐसा बीहड़ नहीं, जहां डकैतों का वास होता हो। बल्कि इस बीहड़ में सदियों से दो बाबाओं का वास रहा है। तहसील से सिर्फ दो किमी दूरी पर स्थित कपालेश्वर महादेव मंदिर में छिपे एक रहस्य की खबर लगी तो उत्सुकता जाग उठी। हमने इस मंदिर के रहस्य को जानने के लिये मंदिर की तरफ रुख किया। जैसे ही हम मंदिर के भीतर दाखिल हुए तो भगवान शिव का वह स्वरूप देखने को मिला। जो आज तक कहीं नही देखा। जहां भगवान शिव के शिवलिंग के साथ सैयद बाबा की मजार बिल्कुल अनूठी दिखाई दे रही थी। यहां पर दोनों बाबा एक साथ विराजमान हैं और लोग सिर नवाते नजर आ रहे थे। जब दिल मे खयाल आया कि आखिर शिवलिंग व मजार एक साथ होने की वजह क्या है, तो मंदिर का निर्माण कराने वाले कनौजीलाल मिश्रा की चौथी पीढ़ी से बात हुई। उनके द्वारा बताया गया रहस्य जानकर हम हैरान रह गए।

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क्या है शिवलिंग व मजार का रहस्य

डेरापुर निवासी पंडित कनौजीलाल मिश्रा ने इस मंदिर का निर्माण सन 1894 में करवाया था। उस वक्त वह फैजाबाद जिले के असिस्टेंट कमिश्नर पद पर तैनात थे। उस जमाने मे जमींदारी की प्रथा थी। एक दिन कनौजीलाल घर आए हुए थे। रात को सोते हुए उन्हें सपने में दिखाई दिया कि उनके घर से कुछ दूरी पर जंगल में भगवान शिव का शिवलिंग है और उस पर चरवाहे खुरपी रेतने का काम कर रहे हैं। खुरपी की रगड़ लगने से शिवलिंग से खून बह रहा है। सुबह होते ही कनौजीलाल ने उस जंगल की तरफ रुख किया और वहां पहुंच गए। सपने में जो जगह दिखाई पडी थी, ठीक उसी जगह पर एक पत्थर दिखा, जिससे खून निकल रहा था। इसके बाद उन्होंने वहां खुदाई शुरू कराई तो एक विशाल शिवलिंग दिखाई दिया। लेकिन जैसे-जैसे खुदाई हुयी तो शिवलिंग का स्वरूप देख लोग सन्न रह गए। दरअसल इस शिवलिंग के साथ एक मजार भी थी, जिसमें खुदाई करके लोग शिवलिंग व मजार का अंत देखना चाहते थे, लेकिन काफी खुदाई के बाद भी लोगों को प्रतिमा का दूसरा छोर नहीं मिला। थक हारकर कनौजीलाल मिश्रा ने हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए यहां कपालेश्वर मंदिर की स्थापना करा दी। इसके बाद दोनों
धर्मों के लोग आकर यहां पूजा व इबादत करने लगे। हिंदू मजार पर चादर चढ़ाते, तो मुस्लिम भगवान शिव की पूजा में शरीक होते हैं।



वाणेश्वर धाम व कपालेश्वर भाई-भाई

ऐसा ही डेरापुर तहसील के ही बनीपारा में स्थित भगवान शिव का प्राचीन वाणेश्वर मंदिर है। लोग इन दोनों मंदिर को भाई-भाई का स्थान देते हैं। हालांकि वाणेश्वर मंदिर मे शिवलिंग की लाट विशालकाय है और कपालेश्वर की शिवलिंग छोटी होने के कारण वाणेश्वर को बड़ा व कपालेश्वर को छोटा भाई कहते हैं। वाणेश्वर शिवलिंग को दैत्यराज वाणासुर द्वारा स्थापित किया गया और कपालेश्वर धाम का शिवलिंग खुद जमीन से उत्पन्न हुआ है। कपालेश्वर धाम के पुजारी रामनाथ जी का कहना है कि मंदिर में स्थापित मजार व शिवलिंग अपने आप मे एक अनूठा संगम है। इसलिये यहां हिंदू व मुस्लिम दोनों के पर्वों पर जमकर भक्तों सैलाब उमड़ता है। यहां सावन माह में विशेष मान्यता रहती है। लोग स्टाल लगाकर प्रसाद भी वितरित करते है।