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इस मंदिर में सात देवियों की होती पूजा, बहनों के नाम से बसे मोहल्ले

शहर के बारा देवी मंदिर पौराणिक और प्राचीनतम मंदिरों में से एक है।

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Akansha Singh

Oct 06, 2016

temple

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कानपुर। नवरात्र पर्व पर जहां पूरा देश देवी मंदिरों पर भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। शहर में भी कई मंदिरों में सुबह से लेकर शाम तक मां के दरबार पर भक्तों का हुजूम उमड़ता है। लेकिन कानपुर के एक मंदिर में माता के दर्शन के लिए लाखों भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। शहर के बारा देवी मंदिर पौराणिक और प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का सटीक इतिहास तो किसी को नहीं पता। लेकिन कानपुर और आस-पास के जिलों में रहने वाले लोगों में इस मंदिर की देवी के प्रति गहरी आस्था है। तभी साल के बारह महीनों और खास कर नवरात्र में लाखों भक्तों की अटूट आस्था बारा देवी मंदिर में भीड़ के रूप में देखने को मिलती है। दक्षिणी इलाके में स्थित बारा देवी मंदिर का इलाका, बारा देवी के असली नाम से जाना जाता है। सिर्फ इतना ही नहीं देवी के नाम से दक्षिण के ज्यादातर इलाकों के नाम रखे गए हैं। इन इलाकों में बर्रा 1 से लेकर बर्रा 9 तक, बिन्गवा, बारासिरोही आदि। बर्रा विश्व बैंक का नाम भी देवी के नाम पर ही रखा गया है।


सात बेटियों ने धरा मां बारा देवी का रूप

इस मंदिर के बारे में किदवंती है कि जहां ये मंदिर स्थल है वहां से कुछ दूर अर्रा गांव में लठुवा बाबा, की बारा कन्याऐं थी।उनमें से जो सबसे बड़ी बहन थी उसका विवाह अर्रा गांव में तय कर दिया गया। बड़े ही धूम-धाम के साथ उसकी बारात दरवाजे आई और रात्रि में जब भांवरे पड़ रही थी उसकी समय उसके पिता द्वारा अनुचित व्यवहार कर दिया। इसके चलते बारात बिना दुल्हन के लौट गई। इससे आहत होकर सात बहने घर सुबह निकल गईं और एकाएक पत्थर के रुप में बदल गईं। उक्त स्थान पर एक नीम का पेड़ हुआ करता था जहां कालांतर में सात प्रकार की मूर्तियां प्राप्त हुई है। उस काल के दौरान में यह सात बहने कही जाती थी। जिससे यह प्रमाणित होता है कि ये उन्हीं सात बहनों के प्रतीक चिन्ह है। यह बात पुरातत्व विभाग ने भी प्रमाणित मानी है।


पांच बहने अर्रा गांव में मौजूद

सात बहने किदवई नगर में जा बसी, वहीं पांच बहने बर्रा गांव में अभी भी स्थापित हैं। आगे चलकर उन देवियों में एक तेली को स्वपन देकर अपनी उपस्थिति का आभास कराया और उक्त मंदिर के चार बड़े (चारोे दिशाओं में) गेट बने हुये हैं एवं गगनचुंबी गुंबज चैराहे से दिखाई देते हैं। उक्त मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार हो चुका है।
मंदिर के पुजारी कल्लू माली के मुताबिक एक बार पिता से हुई अनबन पर उनके कोप से बचने के लिए घर से एक साथ 7 बहनें भाग गई। सारी बहनें किदवई नगर में मूर्ति बनकर स्थापित हो गई। पत्थर बनी यही बहनें कई सालों बाद बारादेवी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हुई। कहा जाता है कि बहनों के श्राप से उनके पिता भी पत्थर हो गए थे।



चुनरी बांधकर पूरी होती है मनोकामना

बारा देवी मंदिर में आने वाला हर भक्त अपनी मनोकामना मांग कर चुनरी बांधता है। मन्नत पूरी होने पर वह चुनरी को खोल देता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इस पर लोगों का अटूट विश्वास है। मंदिर परिसर में ही बच्चों के मुंडन संस्कार व कन छेदन जैसे काम लोग बड़ी ही शिद्दत से करते हैं। इस पावन पर्व पर इस प्राचीन मंदिर में एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस मेले में कानपुर के साथ साथ आस पास के जिले के लोग भी आते हैं। इस दौरान यहां पर जिनकी मन्नतें पूरी होती है, वो ज्वारा लेकर माता के दरबार आते हैं।


कल्लू माली का परिवार करता है सेवा

गत सात पीढ़ियों से मंदिर की सेवा में रत कल्लू माली का परिवार है। उनके बेटे बहू और नाती अब मंदिर की सेवा में हिस्सा लेते हैं। उनके परिवार के की एक सदस्य ने बताया की मंदिर में दोनों नावरात्रों में भव्य मेले का आयोजन हुआ करता है। जो कि नगर के बड़े मेलो में प्रचलित है। यहां की क्षेत्र रक्षक देवी के रूप में मानने वाले कुछ संप्रदाय यहां मुण्डन संस्कार, विवाह संस्कार व अन्य संस्कारों को कराते है। कल्लू माली के मुताबिक मंदिर में अपनी सात बहनों के साथ बिराजी बारादेवी भक्तों के सभी मनोरथ पूर्ण करती है और यहां आने वाला हर भक्त यह कहता है। कानपुर सेन्ट्रल स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर दूर दक्षिण में बसा जूही स्थान जहां मां भगवती बारह देवी जी का मंदिर बना हुआ है। यहां मां के दर्शनों को आने के लिए भक्त ओटो रिक्शा ,चार पहिया वाहनों तथा दो पहिया वाहनों के द्वारा भी आ सकते हैं।