3 फ़रवरी 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कानपुर

Sawan 2019: खेरेश्वर धाम में नाग देवता को दूध पिलाते हैं ‘अश्वत्थामा’

भगवान शिव का नागों से किया गया श्रृंगार, सुबह से लेकर देररात तक चला पूजा-पाठ का दौर, मान्यता है कि यहां अश्वस्थामा करते हैं भोले की अराधना।

Google source verification

कानपुर। सावन के पवित्र महिनें Sawan 2019 में सुबह से लेकर शाम तक शिवालयों में पूजा-पाठ का दौर चल रहा है। नागपंचमी के पर्व पर कानपुर के खेरेश्वर मंदिर Khereshwara Temple में भोर पहर से भक्तों का तांता लगा रहा जो देर रात तक चलता रहा। पुरूष, महिला, युवक और युवतियों ने नागों को दूध पिलाकर मन्नत मांगी feeding the serpents । मान्यता है कि यहां हरवर्ष नागपंचमी Nagapanchami के दिन अश्वस्थामा Ashwasthama सबसे पहले आते हैं और शिवलिंग पर बेलपत्र, फूल चढ़ाकर नाग-नागिन Naag-Naagin को दूध पिलाकर चले जाते हैं।

क्या है मंदिर का इतिहास
शहर से तीस किमी की दूरी पर स्थित खेरेश्वरधाम से कांवडिए Kandiye from Khereshwardham मां गंगा का जल लेकर निकलते हैं। यहां मंदिर नदी के किनारे स्थापित है। बताया जाता है कि मंदिर में विस्थापित शिवलिंग है वह स्वयं जमीन से निकला है। यह मंदिर काफी प्राचीन है। गुरू द्रोण पांडेव को शिक्षा-दिक्षा के लिए यहीं पर कई साल बिताए। खेरेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना किया करते थे। मंदिर के महंत जगदीश पुरी बताते हैं कि यहीं पर गुरू द्रोणाचार्य का भी मंदिर और एक सरोवर है। जिस पर भक्त स्नान कर भगवान शिव की पूजा करते हैं। नागपंपमी का खास महत्व है। जिसके चलते लाखों की संख्या में भक्त यहां आकर बाबा खेरेश्वर की पूजा करते हैं।

खेरेश्वर अस्वस्थामा का जन्मस्थल
कहा जाता है द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य की कुटीं यही पर है इसका जिक्र महाभारत में महाभारत में भी है। अश्वाथामा का जन्म यही पर हुआ था। पुजारी बताते हैं रात में मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है। मंदिर के पट खोले जाते है तो भगवान् शिव के शिवलिंग कि पूजा अर्चना की हुयी मिलती है। शिवलिंग पर जल वा अदभुत तरह के फूल चढ़े हुए मिलते है। ग्रामीणों का मानना है कि यह मंदिर काफी प्राचीन है और अश्वाथामा इस मंदिर में पूजा अर्चना करते है। इस मंदिर की ख़ास बात यह है कि नागपंचमी के दिन यदि कोई भी भक्त सच्चे मन से भगवान् शिव कि पूजा अर्चना करता है तो उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।

इस वजह से खेरेश्वर का चुना
मंदिर की जिम्मेदारी जगदीश पुरी के हाथों में हैं। बताते हैं, वो 36 पीढ़ी के पुरोहित हैं, जो खेरेश्वर धाम की देख-रेख करते हैं। बताते हैं सतयुग से यह शिवलिंग स्थापित है। द्वापर में यहां गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम था और उनके पुत्र अश्वाथामा का जन्म भी यही हुआ। जब महाभारत में अश्वाथामा की मणि निकाल ली गयी तो उन्होंने कृष्ण भगवान से कहा कि अब मणि की छतिपूर्ति कैसे होगी। तो भगवान् कृष्ण ने कहा कि जहां पर आपका जन्म स्थल है वहां जाए। कृष्ण ने उनसे कहा कि भगवान शिव की नित्य दर्शन करने से मणि की छतिपूर्ति हो जायेगी। इसी के बाद अश्वस्थाम मंदिर के पास स्थित खुद के मंदिर में रहते हैं और बाबा शिव की अराधना करते हैं।

नागों से मंदिर को सजाया गया
मंदिर में देश के कोने-,कोने से सपेरे विषैले सांपों को लेकर सोमवार को पहुंचे। मंदिर परिसर को नागों से सजाया गया। नागों के दर्शन के लिए भक्त सुबह से कतारों पर लग गए। भक्तों ने नागों को दूध पिला मन्नत मांगी। पुजारी के मुताबिके
इस मंदिर में नागां का विशेस तरीके श्रंगार और पूजन किया जाता है। मंदिर में भगवान विष्णु की जहां भगवान शेष नाग पर खड़े विशाल प्रतिमा हैं तो पहीं भगवन शिव के ऊपर छाया बने भगवान नाग देवता की भी शिवलिंग है। भक्त इस मंदिन दोनों भगवान की एक साथ पूजा कर नागपंचमी के दिन भगवान का आशीर्वाद मांगते हैं। दर्शन करने आई महिलाओं ने हाथो में साप को लेकर तस्वीर भी खींचवाती हैं।

अश्वस्थामा को हमने देखा है
मंदिर में भगवान शिव नित्य दर्शन करने आने वाली भावना का कहना है कि यह सिद्ध मंदिर है। जो शिवलिंग है उसको किसी ने स्थापित नहीं किया है वो स्यंभू शिवलिंग है। हम पिछले 20 सालों से यहां आते हैं पूजा-पाठ के बाद बाबा से आर्शीवाद लेकर ही जाते हैं। ओमप्रकाश बताते हैं कि वह 33वीं पीढ़ी के हैं तो मंदिर मंदिर प्रांगण में मिटाई की दुकान लगाते हैं। ओमप्रकाश एक घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं, सुबह के तीन बजे थे। हम लेटे हुए थे तो सामने से अश्वाथामा जी चले आ रहे थे हमने उनको खूब अच्छी तरह से देखा। जब दरवाजे के सामने आ गए तो उनसे हमारी निगाह में निगाह मिल गयी और वो एकदम से अन्दर चले गए उसके बाद दिखाई नहीं पड़े।