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Independence Day 2018 – एक नहीं दो बार फांसी पर लटकाया, मौत को मात देकर जिंदा निकले तात्या

क्रांतिकारी के पौत्र बिठूर निवासी विनायक राव ने खोला रहस्य, उनके पास भटक नहीं पाए अंग्रेज, फांसी की फैलाई झूठी खबर

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Independence Day 2018 - एक नहीं दो बार फांसी पर लटकाया, मौत को मात देकर जिंदा निकले तात्या

कानपुर। क्रांतिकारी मंगल पांडेय ने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की बिगुल फूंका तो इसकी आंच कानपुर में आई और बिठूर से नानाराव पेशवा ने हथियार उठा जंग-ए-आजादी में कूद गए। फिर ऐसा कारवां बना कि हजारों लोग उनके साथ अंग्रेजी फौज पर मौत कर टूट पड़े। नाना के साथ मराठा सपूत तात्या टोपे ने हाथ मिलाया और यहीं से आजादी के लिए बड़ी लड़ाई का आगाज हो गए। सत्तीचौरा कांड हो या, महाराजपुर, अकबरपुर, घाटमपुर हर जगह अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी। इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं कि तात्या को जागते हुए कभी अंग्रेजों की शक्तिशाली फौज पकड़ नहीं पाई। क्योंकि तात्या सिर्फ पांच घंटे ही सोते थे, बचे समय वह अंग्रेजी सेना से लड़ते रहते थे। तात्या टोपे भारत की आजादी की पहली संघर्ष’1857 विद्रोह’के सेनानायक थे। उनके पौत्र विनायक राव बताते हैं कि दादा जी को कभी भी अंग्रेज फौज पकड़ नहीं पाई। उनकी मौत का किस्सा गढ़ गया और उनके बदले दो क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़ाया। उनकी मौत युद्ध के मैदान में लड़ते-लड़ते हुई थी।

कौन था मराठा सपूत
देश के प्रस्वतंत्रता संग्राम क प्रसिद्ध सेनानायक तात्या टोपे का जन्म जन्म 1805 में पूना में हुआ था। उनके पिता का नाम पांडुरंग येवलेकर। तात्या टोपे के पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय के गृह विभाग का काम देखते थे। अंग्रेजो की कूटनीति के कारण जब पेशवा बाजीराव को पूना की गद्दी छोडकर कानपुर के निकट बिठुर में आकर बसना पड़ा तो उनके साथ पांडुरंग भी तात्या को लेकर बिठुर आ गये। टोपे की शिक्षा-दीक्षा पेशवा के दत्तक पुत्रो और मोरोपंत ताम्बे की पुत्री मनुबाई (झांसी के रानी लक्ष्मीबाई) के साथ हुयी। तात्या बड़ी तीव्र बुद्धि का साहसी व्यक्ति थे। बड़ा होने पर पेशवा ने उसे अपना मुंशी बना लिया। इस पद पर काम करते हुए उसने एक कर्मचारी का भ्रष्टाचार पकड़ा तो प्रसन्न होकर पेशवा ने उसे पुरुस्कार स्वरूप अपनी रत्नजडित टोपी देकर सम्मानित किया। तभी से वह तात्या टोपे के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

गुरिल्ला युद्ध की शुरूआत
तात्या को नाना साहब ने अपना सैनिक सलाहकार नियुक्त किया था। तात्या के नेतृत्व में विद्रोही सेना ने अंग्रेज ब्रिगेडियर जनरल हैवलॉक की कमान का शहर के बिठूर में बहादुरी से मुकाबला किया। संघर्षपूर्ण मुकाबले के बावजूद विद्रोही सेना को जुलाई 1857 में पीछे हटना पड़ा। इस संघर्ष में विद्रोही सेना बिखर गई। तात्या ने बिठूर में अपनी सेनाओं का पुनर्गठन किया और कानपुर में अंग्रेजों पर हमले का मौका खोजने लगे। इस बीच हैवलॉक ने अचानक बिठूर पर हमला कर दिया। तात्या बिठूर की लड़ाई में हार गए। वे बहुत बहादुरी से लड़े। इस बात के लिए अंग्रेज सेनापति ने उनकी तारीफ़ भी की थी। तभी रानी लक्ष्मीबाई भी शहीद हो गई तो उनकी मौत का बदला लेने के लिए तात्या टोपे ने गुरिल्ला युद्ध की शुरूआत कर दी। इस दौरान तात्या ने गुरिल्ला युद्ध का संचालन किया, इन्हीं लड़ाइयों के कारण उन्हें इतिहास में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ छापामार योद्धाओं में गिना जाता है।

फांसी पर सस्सपेंस
स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे की मौत को लेकर दो धड़े अलग-अलग बंटे हैं। तात्या टोपे के पौत्र विनायक राव ने उनकी फांसी की बात को पूरी तरह से नकार दिया है। विनायक राव ने बताया कि हमारे चाचा जी पराग टोपे ने रिसर्च किया था और उसमें दादा जी के जीवन की पूरी कहानी लिखी थी। उस किताब में उन्होंने साफ-साफ लिखा है कि तात्या टोपे को कभी पकड़ा ही नहीं जा सका था, बल्कि उनकी मौत छापामार युद्ध में शहादत से हुई थी। विनायक राव मुताबिक तात्या टोपे की मौतें 1 जनवरी 1859 को युद्ध में लड़ते हुए तोप के एक गोले से हुई थी। राव बताते हैं कि, तात्या की प्रतीकात्मक फांसी अंग्रेजों की एक जरूरत थी। जिसके बिना 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का अंत कठिन था। उनके मुताबिक अंग्रेजों की इस प्रक्रिया के नाट्य रूपांतर में नरवर के राजा ने एक नरबलि देकर गोरे अंग्रेजों की सहायता की। इस बात का प्रमाण इससे भी मिलता है कि, फांसी लगे व्यक्ति ने अपनी आयु 55 वर्ष बताई थी, जबकि उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार उस वक्त तात्या की उम्र 45-46 वर्ष की होनी चाहिए थी।

यह है अंग्रेजों की गढ़ी कहानी
इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं कि अंग्रेजों के दस्तावेजों के मुताबिक 7 अप्रैल 1859 को अपने शिविर में सोते हुए तात्या को उनके साथी नरवर के राजा मानसिंह के विश्वासघात की सहायता से अंग्रेजों ने बन्दी बना लिया था। 8 अप्रैल को वे शिवपुरी में जनरल मीड के शिविर में एक युद्धबन्दी थे। 15 अप्रैल 1859 को उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गयी और 18 अप्रैल 1859 को उन्हें शिवपुरी जेल की चार नम्बर बैरक में फांसी दी गयी थी। कहा जाता है कि उन्हें दो बार फांसी पर लटकाकर अंग्रेजों ने अपनी संतुष्टि की थी। जबकि उनके पौत्र विनायक राव कहते हैं कि कई ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी माना है कि 1857 के संग्राम में अंग्रेजों की हार संभव थी, लेकिन जिस अंदाज में अंग्रेजों ने आम लोगों के खिलाफ मारकाट मचाई और निर्दोषों का नरसंहार किया उससे स्वतंत्रता सेनानियों की मुहीम पर गहरा असर पड़ा। राव ने बताया कि तात्या की कथित मृत्यु के बाद भी अंग्रेज सेना तात्या टोपे को लेकर आशंकित रही।