छतरी पर नवविवाहिता जोड़ों को भोजन कराने की भी परम्परा करौली. करौली में रियासतकालीन कई ऐतिहासिक स्थल है। जिसमें महाराजा गोपालसिंह की छतरी ऐतिहासिक जगहों में शामिल है। मदनमोहनजी मंदिर के ठीक सामने महाराजा गोपालसिंह की छतरी मौजूद है। करौली के महाराजाओं में महाराजा गोपालसिंह का नाम काफी महत्वपूर्ण रहा है। महाराजा गोपालसिंह ने करौली में कई विकास कार्य कराए, जो आज भी यहां की ऐतिहासिकता को दर्शाते हैं। प्रसिद्ध मदनमोहनजी मंदिर की स्थापना भी गोपालसिंह ने ही कराई।
करौली के महाराजा गोपालसिंह की छतरी का है ऐतिहासिक महत्व
करौली. करौली में रियासतकालीन कई ऐतिहासिक स्थल है। जिसमें महाराजा गोपालसिंह की छतरी ऐतिहासिक जगहों में शामिल है। मदनमोहनजी मंदिर के ठीक सामने महाराजा गोपालसिंह की छतरी मौजूद है। करौली के महाराजाओं में महाराजा गोपालसिंह का नाम काफी महत्वपूर्ण रहा है। महाराजा गोपालसिंह ने करौली में कई विकास कार्य कराए, जो आज भी यहां की ऐतिहासिकता को दर्शाते हैं। प्रसिद्ध मदनमोहनजी मंदिर की स्थापना भी गोपालसिंह ने ही कराई। 13 मार्च 1757 में महाराजा गोपालसिंह के देहावसान के बाद उनकी अंत्येष्टि स्थल पर स्मारक का निर्माण कराया, जो गोपालसिंह की छतरी के नाम से जाना जाता है। इतिहासकार वेणुगोपाल के अनुसार पिता कुंवरपाल के स्मारक के पास ही गोपालसिंह की छतरी बनवाई गई। गोपालसिंह की छतरी के पास नवविवाहिता जोड़ों को भोजन कराने की परंपरा भी रही है। इस ऐतिहासिक जगह पर पूर्व में स्वामी दयानंद सरस्वती भी एक बार करौली आगमन पर प्रवचन दे चुके हैं।
शिवालय व हनुमान मंदिर भी है ऐतिहासिक
महाराजा गोपालसिंह की छतरी के पास ही शिवालय और बैठे हनुमान मंदिर भी अपने आप में ऐतिहासिक है। यहां रोजाना अनेक श्रद्धालु पूजा पाठ के लिए आते हैं। विशेष धार्मिक मौके पर यहां भीड़ लगी रहती है। यह मंदिर करौली के अति प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों में शामिल है।
नक्काशी का अद्भुत नमूना
मदनमोहनजी के दर्शनों को बाहर से आने वाले श्रद्धालु यहां के ऐतिहासिक स्थलों का भी भ्रमण करते हैं। जो महाराजा गोपालसिंह की छतरी के दर्शन को भी आते हैं। यह छतरी रियासतकालीन नक्काशी व कलाकारी का अद्भुत नमूना है। रियासतकाल के दौरान पत्थर पर की गई कारीगरी को देख लोग यहां की उत्कृष्टता की सराहना करते हैं। छतरी पर दर्शन के लिए सोमवार को श्रद्धालु अधिक आते हैं।