करौली. सियासतकालीन ऐतिहासिक इमारतों में शहर का सुरक्षा कवच माने जाने वाला परकोटे का अहम स्थान है। परकोटे की शिल्पकारी में रियासतकालीन भव्यता झलकती है। लाल पत्थरों निर्मित सैकड़ों वर्ष पुराना परकोटा आज भी अपनी मजबूती और भव्यता को दर्शाता है। इतिहासकार वेणगुगोपाल शर्मा के अनुसार महाराजा गोपालसिंह ने मराठों के बार बार आक्रमण के चलते अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के लिए मजबूत परकोटे का निर्माण कराया था। मराठा शासन में कई बार आक्रमण हुए। जिससे जनता त्रस्त हो गई थी। ऐसे में सुरक्षा की दृष्टि से 17
करौली. सियासतकालीन ऐतिहासिक इमारतों में शहर का सुरक्षा कवच माने जाने वाला परकोटे का अहम स्थान है। परकोटे की शिल्पकारी में रियासतकालीन भव्यता झलकती है। लाल पत्थरों निर्मित सैकड़ों वर्ष पुराना परकोटा आज भी अपनी मजबूती और भव्यता को दर्शाता है। इतिहासकार वेणगुगोपाल शर्मा के अनुसार महाराजा गोपालसिंह ने मराठों के बार बार आक्रमण के चलते अपनी प्रजा को सुरक्षा प्रदान करने के लिए मजबूत परकोटे का निर्माण कराया था। मराठा शासन में कई बार आक्रमण हुए। जिससे जनता त्रस्त हो गई थी। ऐसे में सुरक्षा की दृष्टि से 1724 से 1757 के बीच परकोटा बनवाया गया था।
सुबह-शाम चलती थी तोप
परकोटा मराठों के आक्रमण के समय प्रजा को सुरक्षित वातावरण प्रदान करने में अहम स्थान रखता था। परकोटे के दरवाजे सुबह खुलते थे और शाम को बंद हो जाते थे। दरवाजों के खुलने और बंद होने का संदेश तोप चलने के माध्यम से मिलता था। सुबह तोप चलने पर दरवाजे खोल दिए जाते थे और शाम को तोप चलने पर दरवाजे बंद कर दिए जाते थे।
सैनिक करते थे गश्त
परकोटे के ऊपर से निगरानी रखने के लिए भी व्यवस्था भी। वहां लगातार सैनिक गश्त करते रहते थे। जो बाहर से आने जाने वाले लोगों पर नजर रखते थे। परकोटे में छोटे छोटे छीद्र बने है। जो आक्रमण के दौरान दुश्मन पर बारूदी गोले दागने के उपयोग में आते थे। परकोटे में 32 बुर्ज भी बने हुए हैं।
यह है खासियत
परकोटे में छह दरवाजे और 11 खिड़कियां है। इसकी ऊंचाई 40 फीट है। सवा दो मील की लम्बाई में फैला परकोटा आज भी इसे देखने वालों को मोह लेता है। परकोटे से भद्रावती नदी का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। इसमें 32 बुर्ज भी बने हुए हैं।