
खरगोन. कुंदा तट स्थित मंदिर में विराजित सिद्धिविनायक गणेश जी की दुर्लभ प्रतिमा।
खरगोन.
दस दिनी गणेशेत्सव की शुरुआत बुधवार से हो रही है। 12 साल बाद यह संयोग बना है कि गणेश चतुर्थी बुधवार को है। ऐसे में इस पर्व का महत्व बढ़ गया है। दस दिनी आयोजन के पहले दिन पत्रिका शहर के प्राचीन सिद्धिविनायक गणेश मंदिर का इतिहास पाठकों के लिए लेकर आया है। रोचक तथ्य ऐसे कि हर कोई अचरज में पड़ जाए। जानिए कुंदा नदी तट स्थित भगवान गणेश की इस विलक्षण प्रतिमा की कहानी, रिपोर्ट की जुबानी।
पुजारी पंडित प्रणय भट्ट ने बताया मंदिर का इतिहास करीब 500 साल पुराना है। यहां स्थापित प्रतिमा एक पाषाण पर बनी है। हाथ में शिवलिंग की अंगूठी है। तीसरा नेत्र और सुंड पर नाग बना है। 108 दाने की रुद्राक्ष माला गले में है। पंडित भट्ट ने बताया करीब 500 वर्ष पहले शहर से कुछ दूरी पर स्थित ग्राम नवलपुरा में नागा साधुओं ने बड़ा यज्ञ किया था। यज्ञ समाप्ति के बाद साधु भगवान की प्रतिमा लेकर वापस निकले। साधु कुंदा तट पर रात्रि विश्राम के लिए रुके। इस दौरान उन्होंने भगवान सिद्धि विनायक की मूर्ति को नदी किनारे रख दिया। विश्राम के बाद सुबह जब साधुओं ने मूर्ति को उठाने का प्रयास किया, लेकिन मूर्ति अपने स्थान से नहीं हिली। अंत में वे भगवान की सिद्धि विनायक की मूर्ति के कुंदा तट पर छोड़कर चले गए। ग्राम नवलपुरा में अब भी यज्ञ और मूर्ति से जुड़े अवशेष हैं।
कमल पुष्प पर विराजित हैं भगवान सिद्धि विनायक
पंडितों के अनुसार भगवान सिद्धि विनायक की मूर्ति कमल पुष्प पर विराजित है। 8 से 9 फीट ऊंचाई वाली प्रतिमा का सिर्फ पांच से छह फीट हिस्सा ही दिखाई दे रहा है। भगवान जिस कमल पुष्प पर हैं, वह फिलहाल पूरी तरह जमीन के अंदर है। मूर्ति के शीश पर चंद्रमा, तीसरा नेत्र व चतुर्भुज रूप में भगवान के एक हाथ में लड्डू और दूसरे हाथ में करमाला लिए विराजित हैं।
दस दिन यह होंगे आयोजन
पंडित भट्ट ने बताया यहां रोजाना काकड़ाआरती और महाअभिषेक होगा। शाम को 7.30 बजे से भजन और इसके बाद महाआरती की जाएगी। भगवान की पोषाक हजारों में है। यहां गर्भग्रह के बाहर ही चांदी के मूषक भी विराजित है। रोजाना भक्तों का तांता लगेगा। मंदिर की आकर्षक सज्जा की गई है। तोरण द्वार सहित अंदर फूलों की सजावट की गई है।
Published on:
31 Aug 2022 09:11 am
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