
खरगोन. आटे के दीपक बनाती लक्ष्मीबाई।
खरगोन. नर्मदा तट नावघाटखेड़ी में शालीवाहन परिसर स्थित आश्रम के पास कुटिया में रहने वाली 80 वर्षीय लक्ष्मीबाई इन दिनों आटे के दीपक बनाने में मशगुल है। दीपक की संख्या 100, 200 नहीं बल्कि असंख्य है। आलम यह है कि आंगन से लेकर कुटिया के अंदर रखी कोठियां, बर्तन सब आटे के दीपक से भरे हैं। इतनी बड़ी संख्या में इन दीपों का निर्माण मां नर्मदा के जन्मोत्सव यानी नर्मदा जयंती के लिए किया गया है। इसके लिए जिन श्रद्धालुओं से जो दान मिलता है उसी से आटा खरीदकर दीपक गढ़े जा रहे हैं। इस कार्य के पीछे लख्मीबाई की सोच है कि श्रद्धालु इन दीपक से नर्मदा के घाट को सजाएंगे। जलने के बाद दीपकों का बचा अवशेष मछलियों को खिलाएंगे। इससे घाट पर स्वच्छता रहेगी, असंख्य मछलियों को पोष्टिक आहार भी मिल सकेगा।
मूलत: धार जिले के धरमपुरी क्षेत्र की रहने वाली लक्ष्मीबाई ने नर्मदा परिक्रमा करने के बाद शालीवाहन क्षेत्र को ही अपना आश्रय स्थल बनाया है। वे करीब 10 साल से श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क आटे के दीपक तैयार कर रही हैं, जिन्हें जन्मोत्सव के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां नर्मदा में प्रज्वलित करते हैं। आटे के इन दीयों से एक ओर जहां श्रद्धालुओं की आस्था पूर्ण होती है, वहीं मछलियों के लिए यह भोजन का बंदोबस्त हो जाता है। नदी को होने वाले प्रदूषण से भी बचाव होता है।
लक्ष्मीबाई के इस पुरुषार्थ को कई सार्वजनिक मंचों से सराहना मिल चुकी है। हाल ही में कसरावद में हुई शिव महापुराण कथा के दौरान कथा वाचक ने व्यास पीठ से इस कार्य की सराहना की। इससे पहले महेश्वर क्षेत्र के किले में आरती के दौरान भी लक्ष्मीबाई की इस निस्वार्थ सेवा की प्रशंसा हो चुकी है।
पर्यावरण के अनुकूल : ये प्लास्टिक, मोम या अन्य गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्रियों से बने पारंपरिक दीपकों की तुलना में पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
जीवों के लिए भोजन : जलाने के बाद ठंडा होने पर, ये दीपक स्वाभाविक रूप से विघटित हो जाते हैं जो मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए सुरक्षित भोजन बन जाते हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला को लाभ होता है।
परंपरा : भारत के कुछ हिस्सों में, विशेष अवसरों और त्योहारों, जैसे दिवाली, छठ पूजा या मंगला गौरी व्रत पर आटे के दीप बनाना एक पारंपरिक प्रथा है।
Published on:
16 Jan 2026 11:10 am
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