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नर्मदा तट का गांव बकावा, यहां हर कंकर में बसते हैं शंकर, गांव के 400 लोग बनाते हैं शिवलिंग, जेएसटी के दायरे में महादेव

शिवरात्रि विशेष पत्रिका एक्सक्लूसिव ...-देश के साथ विदेशों में भी होता है शिवलिंगों का निर्यात, शिवलिंग के कारोबार से चलता है यहां के परिवारों का जीवन

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खरगोन

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Gopal Joshi

Feb 21, 2020

The village of Narmada beach is Bakava

देश के साथ विदेशों में भी होता है शिवलिंगों का निर्यात, शिवलिंग के कारोबार से चलता है यहां के परिवारों का जीवन

कॉमन इंट्रो....
जिला मुख्यालय से करीब ४० किमी दूर नर्मदा के तट पर बसा गांव बकावां। एक ऐसी बस्ती जहां गली-गली में शिवलिंग गढ़े जाते हैं। नर्मदा के पत्थरों को तराशरकर उन्हें शिवलिंग की सूरत देने वाले इस काम में एक दो परिवार नहीं बल्कि आधा गांव ही जुटा है। यह गांव दशकों से शिव के भरोसे है या यंू कहें कि करीब १०० परिवारों के गुजर-बसर का जरिया ही शिवलिंग निर्माण है। महाशिवरात्रि के विशेष अवसर पर शिवलिंगों के गांव पर आधारित पढि़ए पत्रिका की यह खास रपट।
खरगोन.
कहतें हैं नर्मदा का हर कंकर शंकर के समान है। इस बात को सार्थक कर दिया है रेवा के तट पर बसे बकावां के रहवासियों ने। पत्थरों पर विशेष कारीगरी कर उन्हें शिवलिंग का आकार देने व इसी के बूते अपने परिवार का भरण पोषण करने की यह परंपरा करीब १५० साल पुरानी हैं। ग्रामीणों के मुताबिक यहां से अहिल्याबाई होलकर ने पहला शिवलिंग बनवाया। इसके बाद यह परिपाठी ही शुरू हो गई और ग्रामीणों ने इस काम को व्यवसाय के रूप में स्थापित कर दिया। आलम यह है कि यहां के शिवलिंग देश ही नहीं विदेशों में भी निर्यात किए जाते हैं। अन्य प्रदेशों में वस्तुओं के आयात-निर्यात पर जेएसटी लगती है लेकिन यहां के शिवलिंग देश में जेएसटी के दायरे में नहीं आते। यदि शिवलिंग देश से बाहर जाते हैं तो फिर तीन प्रतिशत जेएसटी लगती है। ग्रामीणों के मुताबिक शिवलिंग पर यहां सालाना टर्नओवर 80 लाख से भी ज्यादा का है।

अब होने लगी है शिवलिंग की ऑनलाइन बुकिंग
व्यापारी दीपक नामदेव, केशरीलाल केवट, गोवर्धन केवट, सुशील नामदेव ने बताया पहले खरीदार गांव तक आते थे लेकिन अब शिवलिंगों की बूकिंग ऑनलाइन हो जाती है। दर्जनभर व्यापारियों ने ऑनलाइन ट्रेडिंग कंपनी में भी रजिस्टे्रशन कराया है। देश ही नहीं विदेशों से भी डिमांड आती है। बैंगलुरु से लेकर जयपुर, बनारस, उज्जैन, झारखंड के कई मंदिरों में यहां के शिव स्थापित हैं।

एक इंच से लेकर 25 फीट तक के शिवलिंगों का निर्माण
व्यापारी अखिलेश मुछाला, दूलू केवट, नारायण ठाकुर के मुताबिक यहां 1 इंच से २५ फीट तक के शिवलिंग गढ़े जाते हैं। इनकी कीमत दस रुपए से लेकर चार लाख रुपए तक है। यहां के पत्थरों की खासियत यह है कि कटिंग के बाद शिवलिंगों पर ओम, तिलक, सहित अन्य धार्मिक आकृतियां स्वत: ही उभरती है, जो खरीदारों के लिए आकर्षण का केंद्र बिंदू है। ओम आकृति वाला शिवलिंग ऊंचे दामों पर बिकता है।

फैक्ट फाइल
-05 हजार गांव की आबादी
-२00 वर्ष पूर्व तीन-चार शिल्प कलाकारों ने शुरू किया था काम।
-400 लोग जुटे हैं शिवलिंग निर्माण में।
-01 इंच से 25 फीट तक के शिवलिंग तैयार।

वह समस्याएं जो बनी रोड़ा, समाधान अब तक नहीं
शिल्पकारों ने बताया पूर्व में नर्मदा से निकलने वाले बेशकीमती पत्थरों का उपयोग शिवलिंग निर्माण में किया जाता था। लेकिन कुछ समय से वन विभाग द्वारा पत्थरों के निकालने और उपयोग करने पर रोक लगी है। चूंकि कई लोग इस व्यवसाय से जुड़े है और अब दूसरा काम नहीं कर सकते इसलिए वे कोटा राजस्थान और मंदसौर से पत्थर लाकर शिवलिंग बनाते हैं। लेकिन इसमें खर्च ज्यादा लगता है। व्यापारियों ने प्रशासन से मांग की है कि वन विभाग द्वारा लगाया गया प्रतिबंध हटाया जाए ताकि उनकी रोजी-रोटी पर कोई संकट न आए।

हाल ही में दो शिवलिंग पहुंचे है झारखंड
हाल में ही यहां के निर्मित दो शिवलिंग झारखंड के संत लेकर गए हैं। इन शिवलिंगों की विधिवत पूजा तीर्थ नगरी ओंकारेश्वर में कराई गई। इसके बाद यह शिवलिंग पहले उज्जैन महाकांल पहुंचेे। यहां सिद्ध क्रिया के बाद उन्हें झारखंड में स्थापित किया गया।

हैदराबाद पहुंचाया 9 लाख का शिवलिंग
व्यापारी दीपक नामदेव ने बताया दो साल पहले हैदराबाद से भी शिवलिंग के खरीदार आए थे। उनकी २६ फीट की शिवलिंग की डिमांड थी। सात कारिगरों ने आठ माह सतत पत्थर पर छैनी हथौड़े चलाकर विशाल शिवलिंग तैयार किया। हैदराबाद के व्यापारी इस शिवलिंग को ९ लाख रुपए खर्च कर ले गए।

व्यवसाय को बढ़ाने का दिया आश्वासन
व्यापारियों ने बताया वर्ष 2015 में सूचना प्रौद्योगिकी सचिव आरएस शर्मा दिल्ली व प्रौद्योगिकी सचिव हरिरंजन राव ने यहां आकर शिल्पकारों से मुलाकात की। इस निर्माण कला को समझा। आश्वासन दिया था कि शिल्पकारों की इस कला को बनाए रखने और व्यवसाय को बढ़ाने के लिए हरसंभव मदद की जाएगी। तत्कालीन कलेक्टर केदार शर्मा व डॉ. नवनीत मोहन कोठारी ने भी इस दिशा में पहल की परंतु गांव के हालात बदले नहीं हैं।