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कुपोषण से एक और चायबागान श्रमिक की मौत

डनकन समूह के बागराकोट चायबागन में काम करने वाली मुक्ति सौताल ने आर्थिक अभाव में दम तोड़ दिया

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Paritosh Dubey

Oct 26, 2015

tea garden

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कोलकाता. दार्जिलिंग के डुआर्स के माल महकमा स्थित डनकन समूह के बागराकोट चायबागान में काम करने वाली मुक्ति सौताल ने आर्थिक अभाव में दम तोड़ दिया। वह 44 साल की थी। चायबागान के मजदूरों का आरोप है कि उक्त महिला श्रमिक की मौत भुखमरी और इलाज के अभाव में हुई है। डेढ़ महीने में भुखमरी और इलाज के अभाव में इस चायबागान के सात श्रमिक दम तोड़ चुके हैं।
बागराकोट के मजदूर लरेन्टूस केरकेटा ने बताया कि मुक्ति चायबागान के राई लाईन इलाके में रहती थी और काफी दिनों से कुपोषणजनित बीमारी से ग्रस्त थी। चायबागन खुला होने के बावजूद ठीक समय पर वेतन नहीं मिलने के कारण उसके परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। पैसे के अभाव में उसके परिवार को दाने के लाले पड़ गए थे। मुक्ति को चायबागान के अस्पताल में ले जाया गया, लेकिन वहां पर्याप्त दवाएं नहीं मिली। इस कारण उनका ठीक से इलाज नहीं हो सका और सोमवार सुबह घर में उनकी मौत हो गई।
केरकेटा ने बताया कि चायबागान खुला जरूर है, लेकिन मालिक पक्ष ने आठ महीने से बंद जैसी स्थिति पैदा कर रखी है। जिस कारण बंद बागान मजदूरों को मिलने वाली सरकारी सहायता भी नहीं मिल पा रही है। समय से वेतन नहीं मिलने के कारण श्रमिकों को ठीक से खाना भी नहीं मिल पा रहा है। मजदूरों की अर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि अधिकतर मजदूर सरकार की ओर से सस्ते में दिया जाने वाला चावल भी नहीं खरीद पा रहे हैं।
- इलाज के अभाव में नहीं हुई मौत
इधर स्वास्थ्य विभाग ने इलाज के अभाव में मुक्ति सौताल की मौत होने से इंकार किया है। जिले के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी प्रकाश मिर्धा ने कहा कि मुक्ति की मौत इलाज के अभाव के कारण नहीं हुई है। स्वास्थ्य विभाग की मेडिकल टीम नियमित रुप से इन सभी चायबागान में जाती है। इसलिए बिना इलाज के मौत होने का सवाल ही नहीं उठता है। माल के ब्लॉक स्वास्थ्य अधिकारी को जांच करने का निर्देश दिया गया है।
- दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे मजदूर
डूआर्स में डनकन समूह के कुल 14 चायबागान हैं। आठ महीने से इसमें से चार चायबागानों की स्थिति बंद जैसी है। इसके अलावा अन्य 37 चायबागान की स्थिति भी खराब है। इसमें सात चायबागान पूर्ण रुप से बंद हैं। नियमित वेतन नहीं मिलने के कारण भुखमरी से बचने के लिए वे दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं। उनके बच्चे पढाई-लिखाई छोड़ कर आस-पास के शहरी इलाकों के दुकानों और लोगों के घरों में काम करने लगे हैं।