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कामयाब नहीं हुई कुलपति की चाल, कोटा यूनिवर्सिटी से छिन गई बीएसटीसी

सरकार ने कोटा विश्वविद्यालय से प्री बीएसटीसी 2018 और डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन प्रवेश परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी छीन ली है।

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कोटा

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Zuber Khan

Feb 07, 2018

kota univarsity

कोटा . सरकार ने कोटा विश्वविद्यालय से बेसिक स्कूल टीचिंग कोर्स (प्री बीएसटीसी 2018) और डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (डीएलएड) प्रवेश परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी छीन कर बांसवाड़ा के गोविंद गुरु जनजाति विश्वविद्यालय को सौंप दी है। कोटा विवि के कुलपति प्रो. पीके दशोरा ने इस प्रवेश परीक्षा को आयोजित कराने के लिए सरकार से अपना कार्यकाल बढ़ाने की मांग की थी। जिसे सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया।

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गुरु गोविंद जनजाति विश्वविद्यालय के कुलसचिव सोहन लाल कठैत ने बताया कि राज्य सरकार ने उन्हें प्री बीएसटीसी और डीएलएड परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी सौंप दी है। बुधवार को परीक्षा का नोटिफिकेशन जारी कर दिया जाएगा। प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए 12 फरवरी से ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। परीक्षा का आयोजन 6 मई को किया जाना प्रस्तावित है।


नहीं बढ़ेगी फीस
कठैत ने बताया कि प्री बीएसटीसी 2018 प्रवेश परीक्षा की फीस नहीं बढ़ाई गई है। पिछले साल की तरह ही प्री बीएसटीसी संस्कृत, अल्पभाषा और बीएसटीसी सामान्य में से किसी एक पाठ्यक्रम की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए 400 रुपए और सभी पाठ्यक्रमों की परीक्षा में शामिल होने के लिए 450 रुपए परीक्षा शुल्क देना होगा।

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काम नहीं आया दवाब
इससे पहले सरकार ने प्री बीएसटीसी और डीएलएड प्रवेश परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी कोटा विश्वविद्यालय को सौंपी थी, लेकिन कुलपति प्रो. पीके दशोरा ने अपना कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद ही प्रवेश परीक्षा आयोजित कराने का सरकार पर दवाब डाला था। जिसे सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया और प्रवेश परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी भी छीन ली।

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4.50 करोड़ का नुकसान हुआ
कोटा विश्वविद्यालय के कुलपति ने अपना कार्यकाल बढ़वाने के लिए विश्वविद्यालय को 4.50 करोड़ रुपए की चपत लगा दी। प्री-बीएसटीसी 2017 के आयोजन में सारा खर्च निकालने के बाद 8.50 करोड़ की बचत हुई थी। जिसमें से आधा हिस्सा सरकार को देने के बाद कोटा विश्वविद्यालय को करीब 4.25 करोड़ की आय हुई। इस बार यह मुनाफा 4.50 करोड़ से भी ज्यादा का होता, लेकिन कुलपति के फैसले की वजह से कोटा विश्वविद्यालय को इससे हाथ धोना पड़ा।