
नावड़े की होली: इतिहास ने खोला राज, लश्कर के साथ नाव में होकर सवार होली खेलने जाते थे कोटा दरबार
कोटा. वक्त बदला तो सब कुछ बदल गया। सियासत के रंग तो बेमौसम भी बरसना शुरू हो गया, ( Holi Festival ) लेकिन समय की धारा में रियासतकालीन जो रंगत शहर की फिजा में घुला करती थी वो आज भी कहानी किस्सों में ही सही लेकिन जीवन में रंग भर देने को काफी है। बात होली की हो रही है। वह भी चंबल किनारे बसे शहर की होली की। यूं तो यहां शहर जब परकोटे की सीमा तक सीमित था उसके भी पहले से होली के तराने गूंजें और सौहार्द के रंग बिखरे हैं, पर जहां तक रियासतकालीन होली ( History Of Princely Holi ) की बात की जाए तो उस दौर की होली की रंगत आज भी शहरवासियों को उल्लास व उमंगों से भर देती है। जिक्र कर रहे हैं रियासतकालीन नावड़े की होली का।
होलिका दहन के साथ हो जाती थी धूम शुरू
इतिहासविद् फिरोज अहमद बताते हैं कि शहर में होली के रंगों के संग आत्मीयता बरसती थी। फाल्गुनी पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ ही होली की धूम शुरू हो जाती थी, लेकिन शहरवासियों को नावड़े की होली का खास इंतजार रहता था। चैत्रबदि तृतीया को नावड़े की होली का आयोजन होता था। इस दिन दरबार प्रजा के साथ होली खेलने के लिए निकलते थे। इस दौरान राजा व प्रजा के मध्य आत्मीयता का रंग चढ़ता था। दरबार काफिले के साथ टिपटा क्षेत्र में चंबल के किनारे घाट से विशेष नाव में सवार होकर दरबार निकलते थे। इस नाव में मशीन से संचालित फव्वारा होता था। चंबल के दोनों किनारों पर शहरवासी दरबार के संग होली खेलने को तत्पर उमड़ पड़ते थे। लोगों की भीड़ होती थी, महाराव फव्वारे नुमा पिचकारी से लोगों के साथ होली खेलते थे। चंबल के लहरों की तरह किनारों पर आनंद की हिलौर चलती थी। नावड़ा जिधर से गुजरता और फव्वारा जिधर की ओर चलता वहां खुशियों भरा शोर उठता था। दरबार कभी इस किनारे तो कभी उस किनारे जाते थे। काफिले में नर्तक नृत्य करते व गायन करते हुए चलते थे। यह काफिला लाडपुरा तक जाता था। वहां एजेंटी बंगले से पोल्टीकल एजेंट दरबार से होली खेलने आते थे। होली खेलने के बाद लाडपुरा वह कार में सवार होकर अपनी कोठी पर चले जाते थे।
यूं बढ़ता था सिलसिला
होली की रंगत का सिलसिला यूं ही आगे बढ़ता चला जाता था। चैत्रबुदि चतुर्थी पर महाराव उम्मेदसिंह द्वितीय पहले हाथी पर सवार होकर दरबार पूरे लवाजमें के साथ प्रजा के संग होली खेलने निकलते थे। शुरुआत जनाना महल से होती थी। वह पहले जनाना महल में महारानियों के संग होली खेलते थे। फिर जलेब चौक में भाई, बंधु, उमराव,जागीदारों के साथ। बाद वे बसंत गज, हथनी चंचला, हथनी पलयथा वाली,रूप कली समेत अन्यहाथियों पर सवार होकर लवाजमा प्रमुख मार्गों से होते गुजरता और होली की रंगत बिखरती थी। दरबार लवाजमे के साथ रामपुरा डाकखाने जाते थे, वहां से दरबार कार या बग्धी में सवार होकर कोठी चले जाते थे। शाम को बृजविलास बाग में पातिया व दरीखाना होता था। इसमें ईनामात दिए जाते थे। यह होली खेली जाती थी।
Published on:
09 Mar 2020 08:00 am
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