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Holi Special: 300 रंगों से सजी है झाला जालिम सिंह की हवेली, 250 पुरानी चित्रकारिता में झलकी है होली की भव्यता

History Of Princely Holi, Holi Special Story. Holi Festival in India : कोटा रियासत का हर महल में होली की सतरंगी छटा बिखरी है। हाथी और घोड़ों के साथ कोड़ों से खेली जाने वाली होली के जीवंत चित्रों से सजी है झाला जालिम सिंह की हवेली।

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कोटा

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Zuber Khan

Mar 09, 2020

Holi Special

Holi Special: 300 रंगों से सजी है झाला जालिम सिंह की हवेली, 250 पुरानी चित्रकारिता में झलकी है होली की भव्यता

कोटा. यूं तोकोटा रियासत का हर महल बेहद खूबसूरत है और इनकी खूबसूरती में चार चांद लगाती है बरसों पुरानी चित्रकारिता। बहुरंगी चित्रों से सजी महलों की दीवारों पर दिलकश चित्रकारिता आज भी अपना जलवा बिखेर रही है। पर्यटकों को अपनी खूबसूरती का दीवाना बना देती है। इन चित्रों को देखकर रियासतकाल में होली की भव्यता का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं। यहां हर महल में होली की सतरंगी छटा बिखरी है। हाथी और घोड़ों के साथ कोड़ों से खेली जाने वाली होली के जीवंत चित्रों से सजी है झाला जालिम सिंह की हवेली। यह हवेली कोटा गढ़ पैलेस के पिछले हिस्से में 80 कमरों और 50 बरामदों में फैली है। इस हवेली में करीब 250 साल पहले हुई चित्रकारी का जोड़ तो पूरे राजस्थान में दूसरा कहीं नहीं मिलता। 300 से भी ज्यादा बहुरंगी चित्रों से सजी इस हवेली की ऊपरी मंजिल की पूरी दीवार पर बने विशाल भित्ति चित्र को देखकर उस दौर में होली की भव्यता का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। इस चित्र में महाराव उम्मेद सिंह प्रथम को विशाल जुलूस के बीच होली का उत्सव मनाते हुए चित्रित किया गया है। इस भित्ति चित्र में रंगों और पिचकारी के साथ लाल गुलाल का बखूबी इस्तेमाल किया गया है।

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बड़ा महल
यहां होली के भित्ती चित्रों के साथ ही लघु चित्र भी देखने को मिलते हैं। अंदर वाले कक्ष में बने भित्ति चित्र में हाथियों पर बैठकर राजपरिवार के सदस्यों को जनता के साथ गुलाल से होली खेलते हुए दिखाया गया है। वहीं कांच जडि़त आठ से दस इंच के लघु चित्रों में महाराव को महल के झरोखे से गुलाल फेंकते और नायिकाओं को पिचकारी चलाते दिखाया गया है।

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कंवरपाद महल
यहां 3 बाई 8 फुट के एक ब्लैक एंड व्हाइट स्कैच में रामपुरा बाजार में होली खेलने का दृश्य चित्रित किया गया है। जिसमें महाराव हाथी पर बैठकर फव्वारे से रंगों की बौछार कर रहे हैं। महिला-पुरुष एक दूसरे पर गुलाल डाल रहे हैं और ढ़ोल नगाड़ों पर नृत्य करते हुए नृत्यांगनाएं भी चित्रित की गई हैं।

( ऐतिहासिक तथ्य इतिहासकार डॉ. जगत नारायण, इतिहासविद फिरोज अहमद और कोटा भित्ति चित्रांकन परंपरा पुस्तक से लिए गए हैं।)