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होली की रसीदें काट सत्तु पहलवान ‘स्वीडन’ से लाएंगे ‘नोबेल पुरस्कार’, चौबे-जी बोले-मेरा भी करा दो ‘जुगाड़’

चौबे जी यह बताओ ये नोबेल का फार्म कहां मिलता है ? इसके लिए फीस कितनी और कहां जमा करनी होगी? और कागज क्या-क्या लगाने पड़ेंगे?

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कोटा

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Zuber Khan

Mar 20, 2019

Holi festival

होली की रसीदें काट सत्तु पहलवान 'स्वीडन' से लाएंगे 'नोबेल पुरस्कार', चौबे-जी बोले-मेरा भी करा दो 'जुगाड़'

कोटा. नोबेल पुरस्कार की कामना ऐसी पवित्र और मासूम कामना है, जिससे कोई भी राजनेता मुक्त नहीं, लेकिन इधर जबसे पड़ोसी देश के वजीरे आजम ने नोबेल शांति पुरस्कार की ख्वाहिश जाहिर की है, मेरे मोहल्ले में तो मानों बाढ़ सी आ गई है । हर ऐरा-गेरा नोबेल हथियाना चाहता है। अखबारों में छपने छपाने के कारण अपनी मोहल्ले में थोड़ी बहुत साख है। सो जब भी कोई पेचीदा मामला फंसता है, मेरे पास बेधड़क चले आते हैं।

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मुझे भी आत्मसंतुष्टि होती है कि घर में पत्नी और बच्चे भले ही न सुनते, लेकिन मोहल्ले के लोग तो तवज्जो देते हैं। सुबह समाजसेवी धरमचंद जी पधारे। बिना किसी औपचारिकता के बोले 'चौबे जी यह बताओ ये नोबेल का फार्म कहां मिलता है ? इसके लिए फीस कितनी और कहां जमा करनी होगी? और कागज क्या-क्या लगाने पड़ेंगे?

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मुझे बोलने का मौका दिए बगैर बोले - 'जब इतने सारे सम्मान कबाड़ लिए हैं सिटी आइकान, नगर श्री तो सोचा यह ससुरा नोबेल भी ले ही डालें। मैंने उनको समझाया कि यह पुरस्कार विश्व का प्रतिष्ठित पुरस्कार है और अपने चाहने से नहीं मिलता, लेकिन वो समझने को तैयार ही नही थे। कहने लगे कि मैं मोहल्ला शांति समिति का महासचिव भी हूं। न जाने कितने पति पत्नियों के बीच समझाइश की है। क्या ये पर्याप्त नहीं है? मैंने जैसे तैसे उनको टाला कि सत्तू पहलवान आ धमके।

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बोले - क्या चक्कर है , वो आदमी इतनी बीबियां छोड़छाड़ के भी नोबेल मांग रहा है और एक हम परम ब्रह्मचारी और लंगोट के पक्के चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। यह नहीं चलेगा, बहुत गलत करेंगे नोबेल वाले। पता बताओ? पांच-सात लौंडे भेज दूंगा, सब ठीक हो जाएंगे। मैंने कहा - स्वीडन में है ऑफिस। सत्तू पहलवान बोले - चिंता मत कर, होली के लिए चंदे का जुगाड़ करेंगे, कुछ रसीदें ज्यादा काट देंगे, लेकिन नोबेल न छोड़ेंगे। न जाने कितने छोरे-छोरियों को आत्महत्या से बचाया है।

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हर साल दंगल करवाते हैं और क्या चाहिए? नोबेल के लिए इतनी मारामारी देखकर मेरे अंदर का लेखक भी हिचकोले लेने लगा। सोचा साहित्य का तो न इस जन्म में मिलेगा न अगले जन्म में। क्यों न शांति के लिए ट्राइ करें? आखिर यहां साहित्य से कम राजनीति है। मेरे जैसा शांति दूत भला कौन है? घर में पत्नी की ज्यादतियों के खिलाफ उफ तक नहीं करता। आफिस में सदा बॉस की हां में हां मिलाता हूं।


मैंने डरते डरते अपनी यह सद्इच्छा पत्नी के सामने जाहिर की। सुनकर हंसने लगी, फिर बोली, क्या फिर भांग पी ली है? मैंने कहा - नहीं मैं सीरियस हूं। इतना सुनते ही पत्नी बड़बड़ाने लगी। अरे जब तुम नोबेल की सोच सकते हो तो मैं क्यों नहीं? आज तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी शांति है सब मेरी ही वजह से है।


इस सच को मैं कैसे झुठलाता। फिर वो कहने लगी - गली गली बांटो नोबेल। कोई रह न जाए ...यह दिल मांगे नोबेल पीस फॉर एवरीवन...। होली पर हम सबने भंग की तरंग में पड़ोसी के घऱ में रंग, गुलाल और कीचड़ फेंका। उन्हें चैन से रहने नही दिया। आखिर यही तो कसौटी है नोबेल शांति पुरस्कार की। मैं कोई गल्त बोल्या क्या?

-डॉ. अतुल चतुर्वेदी, व्यंग्यकार