कोटा बैराज की दायीं मुख्य नहर में इस बार मार्च के आखिरी तक पानी छोड़ा जाएगा। फरवरी माह में तापमान अधिक होने से गेहूं की फसल में पानी की मांग बढ़ गई है। तापमान में वृद्धि के साथ ही मध्यप्रदेश ने भी अपने हिस्से का पूरा पानी देने की मांग की है। ऐसे में जल संसधान विभाग ने मध्यप्रदेश को भी पानी की मात्रा बढ़ा दी है। वहीं कोटा सम्भाग में तापमान में वृद्धि से गेहूं की फसल में सिंचाई की जरूरत को महसूस करते हुए किसानों ने भी पानी की मांग बरकरार रखी है। नहरी तंत्र के टेल क्षेत्र में पानी पहुंचाने का किसान दबाव बना रहे हैं।
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पूरी क्षमता से नहर में चल रहा पानी
अधिशासी अभियंता एमपी सामरिया ने बताया कि तापमान में वृद्धि से गेहूं की फसल के लिए राजस्थान सहित मध्यप्रदेश ने पूरी क्षमता से पानी छोडऩे की मांग की है। अभी दायीं मुख्य नहर में पूरी क्षमता 6250 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। मध्यप्रदेश को भी पूरा पानी 3000 क्यूसेक दिया जा रहा है। दायीं मुख्य नहर से हाड़ौती क्षेत्र में रबी फसल के लिए 15 मार्च तक व मध्यप्रदेश के लिए इसके बाद भी पानी छोड़ा जाता है, लेकिन इस बार किसानों की मांग व गर्मी को देखते हुए पूरे मार्च ही नहर में पानी छोड़ा जाएगा।
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टेल क्षेत्र में पानी पहुंचाने का दबाव
राष्ट्रीय किसान संगठन के राष्ट्रीय मंत्री जगदीश शर्मा ने बताया कि दायीं मुख्य नहर के इटावा, खातौली, ककरावदा, पीपल्दा, सुल्तानपुर व दीगोद के टेल क्षेत्र में पानी पहुंचाने की किसान हर साल मांग करता आ रहा है, लेकिन इन क्षेत्रों के टेल क्षेत्र की माइनरों में या तो कम दबाव से पानी छोड़ा जाता है। दस दिन पानी छोडऩा होता है तो केवल चार दिन ही पानी छोड़ते हैं। अभी तापमान बढ़ गया है। ऐसे में गेहूं की फसल को बचाने के लिए टेल क्षेत्र में पूरी क्षमता से पानी छोडऩा होगा।
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गर्मी से उपज पर पड़ेगा प्रभाव
किसान नेता दशरथ कुमार ने बताया कि हर साल मार्च के प्रथम सप्ताह तक सर्दी का मौसम रहता है। इस बार फरवरी में ही अप्रेल जैसी गर्मी पडऩे लग गई। ऐसे में गेहूं की फसल मार्च तक ही आ जाएगी। गेहूं के दाने में पूरा दूध नहीं बनने पर दाना छोटा रह जाएगा और उत्पादन भी 15 से 20 प्रतिशत कम हो जाएगा।
गर्मी से उपज पर भी पड़ेगा प्रभाव
किसान नेता दशरथ कुमार ने बताया कि हर साल मार्च के प्रथम सप्ताह तक ठंडक का मौसम रहता है। इस बार फरवरी में ही अप्रेल जैसी गर्मी पडऩे लग गई। ऐसे में गेहूं की फसल मार्च तक ही आ जाएगी। ऐसे में गेहूं के दाने में पूरा दूध नहीं बनने पर दाना छोटा रह जाएगा और उत्पादन भी 15 से 20 प्रतिशत कम हो जाएगा।