
राजस्थान (फोटो: पत्रिका)
प्रदेश की स्मार्ट सिटी जयपुर, उदयपुर, कोटा और अजमेर… कागजों, प्रेज़ेंटेशन और योजनाओं में भविष्य की तस्वीर दिखाते हैं, लेकिन जमीन पर उतरते ही ‘स्मार्ट’ शब्द अपनी चमक खो रहा है। टूटी सड़कें, उड़ती धूल, जाम में फंसी जिंदगी और जहरीली होती हवा…यही इन शहरों की रोजमर्रा की पहचान बनती जा रही है।
राजधानी जयपुर की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। एक ओर करोड़ों रुपए के फ्लाईओवर, एलिवेटेड रोड और सीवरेज प्रोजेक्ट्स की घोषणाएं हैं, दूसरी ओर सड़कों पर गड्ढों की ऐसी श्रृंखला कि वाहन नहीं, धूल और प्रदूषण तेजी से दौड़ते हैं। हालात यह हैं कि शहर का एक्यूआई 200 के पार जा चुका है और पीएम-2.5 व पीएम-10 का स्तर कई इलाकों में 400 तक पहुंच रहा है। कमोबेश यही स्थिति कोटा की भी है। जहां देशभर के लाखाें बच्चे पढ़ने आते हैं। विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं कि 80 फीसदी प्रदूषण का कारण सड़कों की धूल है। यानी खराब इंफ्रास्ट्रक्चर सीधे लोगों की सांसों पर हमला कर रहा है।
विडंबना यह है कि यह समस्या अचानक पैदा नहीं हुई। कहीं बिजली-पानी की लाइन डालने के बाद सड़क की मरम्मत नहीं, कहीं सीवर लाइन डालने के दो साल बाद भी सड़क अधूरी पड़ी हैं। रोड स्वीपिंग के नाम पर केवल औपचारिकता। नतीजा, वाहनों के साथ उड़ती धूल, आंखों में जलन, सांस की बीमारी और अस्पतालों में बढ़ती भीड़। क्या यही स्मार्ट सिटी का हैल्दी मॉडल है?
दूसरी ओर, आंकड़े बताते हैं कि इन चारों स्मार्ट शहरों में पिछले कुछ वर्षों में सड़कों, ड्रेनेज, सीवरेज और स्मार्ट सिटी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। सवाल यह है कि इसका नतीजा क्यों नहीं दिखता? असली समस्या विभागों के बीच तालमेल की कमी है। एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा उसे तोड़ देता है।
कोटा को सिग्नल-फ्री सिटी घोषित किया गया, लेकिन आज अतिक्रमण और अव्यवस्थित ट्रैफिक ने उस प्रयोग को मजाक बना दिया है। उदयपुर और अजमेर में भी सड़क, ड्रेनेज और यातायात की समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। स्मार्ट सिटी की मूल अवधारणा-सुव्यवस्थित प्लानिंग, बेहतर जीवन गुणवत्ता और टिकाऊ विकास यहां कहीं नजर नहीं आती।
असल में, हमारे शहर ‘रिएक्टिव मोड’ में चल रहे हैं। सड़कें बोझ से दबती हैं तो एलिवेटेड रोड बना देते हैं। बारिश में जलभराव होता है तो नाले साफ करा देते हैं। मास्टर प्लान, मास्टर ड्रेनेज प्लान और भविष्य की जरूरतों पर गंभीरता से काम ही नहीं होता। शहर फैल रहे हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाएं उस रफ्तार से नहीं पहुंच रहीं।
स्मार्ट सिटी का मतलब केवल चमकते फ्लाइओवर और हाई-टेक साइनबोर्ड नहीं, बल्कि साफ हवा, सुरक्षित सड़कें और सुगम जीवन है। जब शहर की हवा ही जहरीली हो जाए और सड़कें बीमारी की वजह बन जाएं, तो ‘स्मार्ट’ होने का दावा खोखला लगता है। अब वक्त है कि योजनाओं की स्मार्टनेस कागज से निकलकर जमीन पर उतरे, वरना आने वाली पीढ़ियां इन शहरों को स्मार्ट नहीं, बल्कि संघर्षशील शहरों के रूप में याद रखेंगी।
आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com
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Updated on:
22 Jan 2026, 1:20 PM IST
Published on:
22 Jan 2026, 1:20 PM IST
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