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ऐसे थे कुलिश जी : उनका अहसास ही ऊर्जा देता

संयोग ऐसा था कि मेरे उनसे मिलने के कुछ ही दिन पहले उन्होंने औपचारिक रूप से अपने पद से सेवानिवृत्ति ले ली थी। फिर भी उन्होंने बड़े स्नेह से कहा, ‘मैं अब पद पर तो नहीं हूं, लेकिन मैं कार्यालय में फोन कर देता हूं।’ उनके इस सहज सहयोग ने मेरे लिए पत्रिका के द्वार खोल दिए।

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Rajasthan Patrika

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी

16 मई 1988 का दिन मेरे जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया, जब मैंने राजस्थान पत्रिका से पत्रकारिता की शुरुआत की। बचपन से ही लिखने का शौक था और महज 13 वर्ष की उम्र से मेरे लेख प्रकाशित होने लगे थे। स्कूल और कॉलेज के दिनों में मैं कहानी, कविता और लेखन प्रतियोगिताओं में भाग लेती रहती थी। पीएचडी पूरी करने के बाद करीब छह वर्षों तक अध्यापन भी किया, लेकिन मन का झुकाव हमेशा लेखन की ओर ही रहा।

जब मैं जयपुर आई तो मन में विचार आया कि पत्रकारिता को व्यवस्थित रूप से समझा जाए। इसी सोच के साथ मैंने राजस्थान विश्वविद्यालय से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया। डिप्लोमा पूरा होते ही मैं सीधे श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के घर पहुंच गई। उनसे मिलकर अपना परिचय दिया और पत्रिका में काम करने की इच्छा जताई।

संयोग ऐसा था कि मेरे उनसे मिलने के कुछ ही दिन पहले उन्होंने औपचारिक रूप से अपने पद से सेवानिवृत्ति ले ली थी। फिर भी उन्होंने बड़े स्नेह से कहा, ‘मैं अब पद पर तो नहीं हूं, लेकिन मैं कार्यालय में फोन कर देता हूं।’ उनके इस सहज सहयोग ने मेरे लिए पत्रिका के द्वार खोल दिए।

जब मैं पत्रिका कार्यालय पहुंची तो स्थानीय संपादक मोती चंद कोचर जी से मुलाकात हुई। उन्होंने मुझसे कहा, ‘हम आपकी डिग्री नहीं देख रहे, हम यह देखेंगे कि आप यहां क्या काम करती हैं।’ यह बात सुनकर मुझे लगा कि यहां वास्तव में काम और प्रतिभा को ही महत्व दिया जाता है। मुझसे यह भी पूछा गया कि मैं किस विभाग में काम करना चाहती हूं। उस समय मेरे बच्चे छोटे थे, इसलिए मैंने मैगजीन में काम करने की इच्छा जताई और उसी दिन मेरी पत्रिका में जॉइनिंग हो गई।

हालांकि कुलिश जी औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त हो चुके थे, लेकिन वे प्रतिदिन कार्यालय आते थे। उस समय मेरी सिटिंग केसरगढ़ में थी। कुलिश जी की खासियत थी कि वे हर कर्मचारी को जानते थे और उसे नाम लेकर पुकारते थे। वे केवल एक संस्थापक या संपादक नहीं थे, बल्कि एक परिवार के मुखिया की तरह सबके साथ जुड़े रहते थे।

हम सब उन्हें स्नेह से ‘काका जी’ कहते थे और वे मुझे ‘मंजुला बेटी’ कहकर पुकारते थे। इस संबोधन में जो अपनापन था, वही पत्रिका की कार्य संस्कृति की असली पहचान थी। शुरुआत में मैंने इतवारी पत्रिका में काम किया और बाद में इंचार्ज भी बनी। इस दौरान कुलिश जी मेरे लेख पढ़ते थे और जरूरी सुझाव देते थे। उनकी टिप्पणियां हमेशा मार्गदर्शन देने वाली होती थीं।

एक बार पास के एक गांव में सामूहिक बलात्कार की दर्दनाक घटना हुई थी। मामला इतना गंभीर था कि सरकार को भी विधानसभा में जवाब देना पड़ा। उस समय मुझे और मेरी साथी सुमन को पीड़िता से बात करने के लिए गांव भेजा गया। जब हम लौटे तो उस रिकॉर्डिंग को तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह जी सहित कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने सुना और हमारे काम की सराहना की। वह अनुभव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

मैंने एक बार गोटा विषय पर एक शोधपरक लेख लिखा था। अधिक जानकारी के लिए मैं काका जी से मिलने उनके घर भी गई। उन्होंने और काकी जी ने बहुत आत्मीयता से विषय की जानकारी दी। विदा होते समय उन्होंने बद्रीनाथ धाम की एक तस्वीर भेंट की। वह तस्वीर आज भी घर के मंदिर में सजी हुई है। आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो महसूस होता है कि कुलिश जी से मिला स्नेह, उनका विश्वास और उनकी सीख ही मेरी पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी है।

(लेखक पत्रकार के रूप में पत्रिका से लंबे समय तक संबद्ध रहीं)