26 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कोटा के शाही दशहरे मेले की 10 कहानियांः परंपराओं छूटी तो खत्म हुआ अनूठापन

124 साल में कोटा के शाही दशहरे मेले तमाम बदलाव आए। कोटा में रावण को जलाने की बजाय उसका वध किया जाता था।

2 min read
Google source verification
Kota Dussehra Fair, Kota Imperial Dussehra Fair, Dussehra in Kota, Jagat Narayan, Rajasthan Patrika, Kota Patrika, 124th Dussehra Fair in Kota, Patrika News, Kota News, of kota Dussehra Fair, Kota royal Dussehra, Cultural Journey of Kota Dussehra

Journey of Kota s royal Dussehra Fair

दुनिया भर में शायद कोटा ही ऐसी जगह होगी जहां रावण को जलाने के बजाय उसका वध किया जाता था। वक्त के साथ कोटा के शाही दशहरे मेले की परंपराओं में भी खासा बदलाव आया, लेकिन एक चीज जो नहीं बदली वह थी रावण के ज्ञान को सम्मान देने की परंपरा। जिसके चलते उसे आज भी रावण नहीं रावण जी कह कर बुलाया जाता है। ऐसे ही परंपराओं के तमाम बदलाव पर नजर डाली इतिहासकार फिरोज अहमद ने।


पूरी दुनिया रावण जलाती है, लेकिन कोटा में रावण का वध किया जाता था। वध से पहले हरकारा रावण को समर्पण के लिए मनाने जाता था, लेकिन तोपें चलाकर युद्ध की घोषणा होती थी। ये सब छोडि़ए रावण की विद्वता का ऐसा सम्मान था कि उसे रावणजी कहा जाता था। वध के लिए गढ़ से निकलने वाली सवारी राजसी ठाठ-बाट और परंपराओं की कहानी बताती थी। पर, आधुनिकता की दौड़ ने जड़ों से दूर कर दिया। नहीं तो मैसूर से ज्यादा भीड़ कोटा दशहरा देखने आती थी।

Read More: कोटा के शाही दशहरा मेले की 10 कहानियांः 9 दिन चलता था असत्य पर सत्य की जीत का शाही जश्न

परंपराओं से कटा दशहरा

इतिहास तभी आकर्षक होता है जब उसका अनूठापन बरकरार रहे। करीब सवा सौ साल के सफर में दशहरा मेला काफी हद तक परंपराओं से कट गया है। कोटा में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के साथ मंदोदरी और खर-दूषण का वध होता था। दशहरा मैदान में इनके पक्के बुत बने थे। पंचमी के दिन से इन पर लकड़ी के सिर सजाते थे। पहले दिन रावण का मुंह लाल होता था और लोग उसे कंकड़ी मारते थे। मान्यता थी कि ऐसा करने से मुसीबतें दूर होती हैं। कंकड़ी आज भी मारी जाती है, लेकिन रावण को छोड़ बाकी बुत तोड़ दिए गए। दशहरा मेला में बड़ा आकर्षण १९६३ तक तोपों की गोलाबारी थी। नौ दुर्गा, नारायण बाण, नगीना, बलम देज, ढाई सेर, ऊंदरी-सुंदरी और सौ कंडे की नाल जैसी तोपें थीं।

Read More: कोटा के शाही दशहरे मेले की 10 कहानियांः छोटो छै...यो कोटो छै...दशहरे को शाही मेलो छै

खरीदारी हुई खत्म

दशहरा प्रजा की मदद के लिए भी मनाया जाता था। मेले में आने वाले दुकानदारों से कर वसूली नहीं होती थी। दाम कम होने से लोग दूर-दूर से लोग खरीदारी करने आते थे। टिपटा से दुकानें सजना शुरू हो जाती थीं। पशु बाजार में ग्रामीण पशुओं को अच्छे दामों पर बेचने और खरीदने के लिए आते थे। यदि पशु मेला दूर जाएगा तो ग्रामीणों का जुड़ाव कैसे रहेगा? एक कहावत आज भी है:- रावणजी को तीसरो, कोटा भरे नीसरो। यानि दशमी के तीन दिन बाद मेला खत्म होता था।

Read More: कोटा के शाही दशहरे मेले की दस कहानियांः 124 साल से कायम है परंपराओं का आकर्षण

तो देश ही नहीं दुनिया में नाम होगा

कोटा मेला लोक संस्कृति को प्रोत्साहित करने का बड़ा मंच था। स्थानीय कलाकारों के साथ ही हरिवंश राय बच्चन जैसे कवि और हेमंत कुमार जैसे कलाकार यहां आते थे। लेकिन अब तो ऐसे लोगों को भी बुलाया जाता है जिन्हें परिवार के साथ सुनने जाना लोग पसंद नहीं करते। कई बार लगता है कला के कद्रदानों की जगह हुल्लड़बाजों ने ले ली है। परंपराओं को जीवित रखें तो मैसूर की तरह की कोटा मेला राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक ख्याति प्राप्त कर सकता है।

(जैसा कि इतिहासकार फिरोज अहमद ने संवाददाता विनीत सिंह को बताया)