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मेडिकल कॉलेज में शरीर विज्ञान से पहले पढ़नी पड़ती थी उर्दू…देखिये सवा सौ साल पहले चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकें

उर्दू में एमबीबीएस की पढ़ाई, अंग्रेजी के अलावा भारतीय भाषा में ही बन सकते थे डॉक्टर

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कोटा

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Suraksha Rajora

Nov 06, 2019

मेडिकल कॉलेज में शरीर विज्ञान से पहले पढ़नी पड़ती थी उर्दू...देखिये सवा सौ साल पहले चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकें

मेडिकल कॉलेज में शरीर विज्ञान से पहले पढ़नी पड़ती थी उर्दू...देखिये सवा सौ साल पहले चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकें

@सुरक्षा राजौरा कोटा. मेडिकल साइंस की पढ़ाई और बाद में प्रैक्टिस अंग्रेजी में ही होती है। बरसों से यही सिलसिला हम देखते आ रहे हैं। आपको यह जानकर अचरज होगा कि एक दौर वह भी था, जब छात्र उर्दू में एमबीबीएस की पढ़ाई करते थे। देखने सुनने में भले ही यह अजीब लगे, लेकिन आज से करीब सवा सौ साल पहले चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकें उर्दू में भी चलती थी।


कोटा के डाक टिकट संग्रहक नरेन्द्र जैरथ ने इन पुस्तकों को संभाल कर रखा है। उनके दादा डॉ. शादीलाल जैरथ ने इन्हीं पुस्तकों से पढ़ाई कर एमबीबीएस की और बाद में लोगों का उपचार भी किया। वे झालावाड़ रियासत के चिकित्सक रहे। हाड़ौती के शुरुआती डॉक्टरों में उनका नाम शामिल है।


डॉ. शादीलाल ने वर्ष 1899 में एमबीबीएस आगरा के थॉमसन मेडिकल कॉलेज से की थी। इस कॉलेज का नाम आजादी के बाद सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज हो गया। यहां उस दौर में चलने वाली सीआर फ्रांसिस की इंडियन मेडिकल ऑफिसर्स वेड मक्यूम [1874 संस्करण], फ्रेडरिक ट्रीव्स की सर्जीकल एप्लाइड एनॉटमी [ 1889 संस्करण] और ग्रे द्वारा लिखित 1892 संस्करण की एनॉटमी की पुस्तकें उर्दू में उपलब्ध हैं।


उस दौर में मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. वजीर सिंह ने इन पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद किया था। जिसे उन्होंने तब आगरा मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य और नामी सर्जन डॉ. बिलकौक को समर्पित किया था। इनके साथ ही 1917 में लिखी गई कुछ अंग्रेजी की मेडिकल की पुस्तकें भी जैरथ के संग्रह में हैं। इनमें एक पुस्तक गनशॉट इंजरी, बंदूक की गोली लगने से होने वाली चोट के उपचार पर केन्द्रित है। उस दौर में सर्प दंश के काफी मामले होते थे और इससे काफी मौत भी होती थीं।

डॉ. शादीलाल के पुत्र डॉ. एम.एल. जैरथ कोटा के पहले नेत्र सर्जन थे। जानकारों का कहना है कि तब छात्र अंग्रेजी में कमजोर होते थे और उर्दू को पढऩा जानते थे। इसलिए उर्दू में पुस्तकें अधिक उपयोगी मानी गई होंगी।

आम आदमी के लिए देर से खुले दरवाजे
उस दौर में मेडिकल कॉलेजों में सिर्फ सेना से जुड़े लोगों को ही प्रवेश मिलता था। लगातार लड़ाइयों के कारण सेना के जवानों को डॉक्टरों की काफी जरूरत होती थी। आगरा का थॉमसन मेडिकल कॉलेज 1855 में स्थापित हुआ था। बाद में 1872 से इसके दरवाजे आम छात्रों के लिए भी खोल दिए गए।

तब भी होती थी आसान प्रवेश परीक्षा
आज भले ही छात्र नीट जैसे कठिन परीक्षाओं में चयनित हो कर मेडिकल कॉलेज की चौखट पर जा पाते हों, लेकिन तब भी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए कॉलेज स्तर पर ही एक परीक्षा उतीर्ण करनी पड़ती थी। इसमें छात्र का सामान्य बौद्धिक स्तर ही जांचा जाता था।