दीपावली पर्व पर ग्रामीण अंचलों में विभिन्न परम्पराओं का निर्वहन आज भी किया जाता है। ऐसी ही एक परम्परा है खेखरा यानि ग्रामीण क्षेत्रों में दीपावली के दूसरे दिन पालतू पशुओं को ट्रेनिंग दी जाती है कि जंगल में वे अपने बछड़े की रक्षा कर सकती है या नहीं। इस परम्परा को ही खेखरा कहते है और ग्रामीण सामूहिक रूप से इसका आयोजन करते है। जिसमें गाय भैंसों को बछड़े सहित एक जगह एकत्र किया जाता है और फिर उन्हें खेखरा खिलाया (ट्रेनिंग) जाता है।
ऐसे खिलाया जाता है खेखरा
डाबी रोड स्थित सोटिया तलाई गांव निवासी रामदेव गुर्जर ने बताया कि दीपावली के दूसरे दिन खेखरा खेल खिलाने की पूर्वजों की परम्परा को अभी ग्रामीण क्षेत्रों में निभाया जाता है। पालतू पशु जंगल में अपने बछड़े की दूसरे जानवरों से रक्षा कर सकते है या नहीं इसके परीक्षण के तरीके की परम्परा को ही खेखरा बोलते है। इस खेल में गांव के सभी पालतू पशु बछड़े के साथ एक जगह एकत्र किए जाते है। फिर एक लकड़ के डंडे के आगे के हिस्से में बछड़े की सूखी चमड़ी को लपेटा जाता है और उसके बछड़े को पकड़कर उस लकड़ी के डंडे के गाय या भैंस के आगे किया जाता है। डंडें पर चमड़ी की गंध व अपने बछड़े को छुड़ाने के लिए गाय या भैंस प्रयास करती है या नहीं इसकी ट्रेनिंग देने वाले खेल को ही खेखरा बोला जाता है। प्रिंस गुर्जर ने बताया कि बरसों से यह परम्परा चली आ रही है।