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Fathers day- बच्चों को जिंदगी में मजबूती से खड़ा होना सिखाती है, पिता की सख्ती में छिपी परवाह

- पिता की परवरिश में होती है कमाल की ताकत

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Deepesh Tiwari

Jun 18, 2023

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आज फादर्स डे है। हर साल जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाने की परंपरा है। पिता का साथ, प्यार और परवाह इन तीनों की किसी भी बच्चे की जिंदगी भी अहम भूमिका होती है। मां की परवरिश से इतर पिता की सख्ती में छिपी परवाह बच्चों को जिंदगी में मजबूती से खड़ा होना सिखाती है।

पिता की परवरिश में बढ़ती भूमिका
पिछले कुछ साल में पिता की भूमिका बदली है। दरअसल अब उनकी परवरिश से जुड़े उन कामों में भूमिका बढ़ गई है, जो मांएं करती आई हैं। बच्चों की जिंदगी में पिता की बढ़ती भूमिका उन्हें मजबूत बनाती है। इसको लेकर हुई स्टडीज में इस बात की पुष्टि हो चुकी है।

पिता से जिंदगी का तालमेल सीखते हैं बच्चे
सोशियोलॉजिस्ट का कहना है बच्चे के जीवन में पिता की मौजूदगी उसमें प्रॉब्लम्स सॉल्विंग स्किल्स डवलप करती है। पिता का साथ बच्चों को रिस्क लेने के लिए प्रेरित करता है। बच्चे बेहतर तालमेल करना सीखते हैं। एक अध्ययन में दावा किया गया है कि जिन बच्चों के पिता उनके साथ खेलते हैं, वे कॉग्निटिव टेस्ट में अच्छा प्रदर्शन करते हैं।

-पिता एक, रूप अनेक-
पिता के कई रूप हैं। किसी को मां और पिता की दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है तो कोई कई बच्चों पिता बनकर अपना फर्ज निभा रहा है। बदलते दौर में पिता की ऐसी जमात भी तेजी से उभरी है जो अनाम पिता हैं। न आज सामने आए हैं न कभी कल आएंगे। लेकिन, इनकी समाज में स्वीकार्यता बढ़ रही है। गॉड फादर और मिशनरी स्कूलों के फादर का समाज में अहम स्थान है ही। शगुन मंगल की रिपोर्ट में पढि़ए पिताओं के अलग-अलग रूप की कहानी...

कई अनाम पिता बच्चों को संसार में लाए
सैकड़ों बच्चों को इस संसार में लाने दिया योगदान, ऐसे पिता को समाज में अपने नाम के बिना जिम्मेदारी निभा रहे हैं। यह पिता की नई जमात है।

हर हफ्ते 50 पुरुष करते हैं डोनेशन
ऐसे लाखों दंपती हैं जो स्पर्म की गुणवत्ता में कमी के कारण बच्चे पैदा नहीं कर सकते। इसी वजह से एग डोनेशन के जरिए पिता बनने का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। मध्य प्रदेश राज्य सहायता प्राप्त जननीय प्रौद्योगिकी एवं सरोगेसी बोर्ड के सदस्य डॉ. रणधीर ङ्क्षसह ने बताते हैं हर हफ्ते शहर में कम से कम 50 पुरुष अपने एग डोनेट करते हैं। यह सैकड़ों बच्चों के अनाम पिता हैं। यहां 5 रजिस्टर स्पर्म बैंक हैं। यह पिताओं की जमात है जिन पर 20 साल पहले लोग यकीन नहीं करते थे। हालांकि अब भी इन अनाम पिताओं की समाज में कोई जगह नहीं है।

ऐसे पिता, जिन्होंने दायरों से बढ़कर लुटाया प्यार- जिम्मेदारियां निभा रहे एकल पिता-
सख्ती से डांट लगाएं तो मां सा लाड़ भी दिखाएं। कुछ ऐसे होते हैं सख्त हथेलियों वाले रूई से फाओं जैसे नर्म दिल वाले पिता जो अपने बच्चों की अकेले परवरिश कर रहे हैं। मिलिए ऐसे सिंगल फादर्स से जिन्होंने अकेले परवरिश दी..

मेरा बेटा है मेरा बेस्ट फ्रेंड - 14 साल से बेटे की परवरिश अकेले कर रहा हूं। बेटा ही मेरा सब कुछ है। हम दोनों एक-दूसरे के बेस्ट फ्रेंड्स भी हैं, बाप-बेटे की तरह लड़ते भी हैं। बेटा 10 साल का था तब पत्नी से डाइवोर्स हो गया। स्कूल की पीटीएम से लेकर सभी जिम्मेदारी उठाता हूं। मम्मी-पापा के सहयोग परवरिश कर पाया हूं। आज बेटा 25 साल को हो गया है।
- संजय जैन, सिंगल फादर

जन्म से दो बच्चों को संभाल रहा - जब से दोनों बच्चों का जन्म हुआ, मैं उन्हें संभाल रहा हूं। बच्चों के जन्म के कुछ समय बाद ही पत्नी से अलग हो गया। मेरी 33 साल की बेटी और 28 साल का बेटा है। पूरी जिंदगी उन्हीं को समर्पित कर दी। कई बार बच्चों से झगड़े हुए। लेकिन, मां सी कोमलता के साथ पिता की सख्ती भी की। 66 साल में उतनी फिक्र है।जेम्स डिसूजा, सिंगल फादर

गॉडफादर

कई बच्चों को छांव देते कई पिता हैं जो समाज में छोड़े गरीब, विकलांग, बच्चों की सेवा कर रहे हैं। अपने बच्चे होने के बावजूद दर्जनों बच्चों के गॉड फादर हैं। इनकी शिक्षा, लालन-पोषण व अन्य जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।

स्लम के बच्चों को पाल रहे- 6 साल पहले कड़ी धूप में दो बच्चों को कंचे खेलते देखा तो मन विचलित हो गया। फिर चार दोस्तों के साथ मिलकर इन बच्चों को पढ़ाना शुरु किया। 2 बच्चों से शुरु हुआ सफर अब तक दर्जनों बच्चों में तब्दील हो चुका है। 52 साल के नरेश मोटवानी शहर के दो स्लम एरिया में बच्चों को पढ़ाते हैं। एक आंगनबाड़ी भी गोद ली है। बच्चों के इंटरेस्ट के हिसाब से करियर चुनने में मदद करते हैं। इनमें कोई थिएटर आर्टिस्ट हैं तो कोई इंजीनीयर हैं। फेसबुक और इंस्टाग्राम के माध्यम से देश-विदेश के कई लोग इनसे जुड़े हैं।

बच्चों को शिक्षा से जोड़ रहे - एकजुट एनजीओ के फाउंडर डॉ. उमेश दीक्षित का बच्चों का इलाज करते-करते इनसे इतना लगाव हो गया कि जॉब छोड़कर घर में ही 36 बच्चों को पालन-पोषण करने की ठानी। परिवार से अलग हुए, छोड़े हुए बच्चों की पूरी जिम्मेदारी निभाई। जब बच्चे इंडिपेंडेंट हो गए तो इनके लिए स्कूल खोला। पिछले 7 साल से यहां हर साल लगभग 300 बच्चे पढ़ते हैं। यह घरेलू ङ्क्षहसा, बाल मजदूरी, परिवार से पीडि़त बच्चों को सहारा देकर सशक्त कर रहे हैं। 23 सालों से ये बच्चों के शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं।

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