
करिश्मा लालवानी
लखनऊ. हिंदी फीचर फिल्मों में नेगेटिव रोल कर ऑ़डियंस का दिल जीतने वाले अभिनेता गोविंद नामदेव ने ये साबित किया है कि किरदार जो भी हो, अगर उसमें दम है, तो वो हर दिल अजीज है। गोविंद नामदेव लखनऊ में फिल्म संताप की शूटिंग कर रहे हैं। इस फिल्म का निर्देशन किया है राकेश ककारीया ने।
बॉलीवुड में महिला प्रधान फिल्मों का क्रेज काफी समय से प्रचलित है। रियल लाइफ स्टोरीज लोगों के दिल को छूती है क्योंकि उसमें वो दर्द और जज्बात होता है, जिससे ऑडियंस खुद को कनेक्ट कर सके। इसी की तर्ज पर संताप की शूटिंग की जा रही है।
न्याय के लिए आवाज उठाती फिल्म है संताप
संताप फिक्शनल फिल्म कम और रियल लाइफ इंसिडेंट ज्यादा है। ये एक ऐसी दलित लड़की की कहानी है, जिसका रेप होता है और वो अपने साथ हुए अन्याय के लिए आवाज उठाती है। इस कैरेक्टर का नाम है सुगीया। दलितों को लेकर गोविंद नामदेव कहते हैं, ''सोशल मीडिया में जिस कदर दलितों के बारे में न्यूज आती है, उससे साफ है कि पहले ये मुद्दे बाहर नहीं थे। अब ये मुद्दे बाहर आ रहे हैं। दलितों को लेकर हर रीजन में ज्यादतियां हुई हैं। पहले उन्हें लेकर ज्यादातर बातें दबी रहती थीं लेकिन सब बाहर आ रहा है।''
आज के खलनायकों में नहीं पहले वाली बात
गोविंद नामदेव ने भले ही बॉलीवुड में नेगेटिव किरदार ज्यादा निभाए हों लेकिन उनके हर किरदार ने हिंदी सिनेमा में एक अलग छाप छोड़ी है। चाहे वो फिल्म सत्या में निभाया किरदार भाऊ ठाकुरदास झाल्वे हो या फिर फिल्म राजू चाचा के विक्रम सिन्हा का किरदार हो। गोविंद नामदेव ने हर किरदार को संजीदगी से अदा किया है। ये पूछे जाने पर कि पहले और आज के विलन में क्या अंतर है। गोविंद नामदेव कहते हैं कि पहले के नेगेटिव किरदार इस तरह के होते थे कि उनका नाम ऑडियंस की जुबां पर आज भी चढ़ा रहता है। जैसे शोले का गब्बर और मिस्टर इंडिया का मोगेंबो। लेकिन आज के विलन में वो बात नहीं है। फिल्म हिट तो हो जाती है। नेगेटिव रोल भी हिट हो जाता है लेकिन वे उतने प्रभावी नहीं होते हैं। आज के एक्टर्स की अदायगी में फर्क है। पहले की फिल्मों में विलन का अलग ही प्रेजेंटेशन होता था। आज के फिल्मों की बात अलग है। वे सही मायनों में नायक नहीं खलनायक होता था। आज की फिल्मों में हीरो-हिरोइन पर ज्यादा फोकस होता है विलन पर कम।
प्राण साहब हैं रोल मॉडल
गोविंद नामदेव हिंदी सिनेमा के मशहूर अभिनेत रहे प्राण को अपना आइडल मानते हैं। उनका कहना है कि वे हर किरदार में खुद को बखूबी ढाल लेते थे। उनकी अदायगी की यही बात दिल को छू जाती है।
लखनऊ में झलकता है अपनापन
नवाबों की नगरी में आए गोविंद नामदेव कहते हैं, ''यहां पहले भी फिल्मों की शूटिंग कर चुका हूं। इस शहर को अलग दृष्टी से देखता हूं। यहां की आबोहवा में सकारात्मक सोच है इसलिए यहां अपनेपन जैसा महसूस होता है। लखनऊ से ऐसा रिश्ता जुड़ गया है कि मन करता है यहां बार-बार आता रहूं।
Published on:
04 May 2018 02:55 pm
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